जिंदगी जीना एक कला है, क्योंकि ज़िंदगी बेहद खूबसूरत है, अनमोल है, अप्रतिम है। हमें इसके महत्व को समझना चाहिए और इसे शिद्दत से जीने की भरसक कोशिश करनी चाहिए। जिंदगी का भरपूर आनंद हम तभी ले सकते हैं, जब हम इसके मर्म को भलीभांति समझ लें। मगर हम इंसान जिंदगी के मर्म को समझने में बहुत समय लगा देते हैं। जिंदगी की खूबसूरती में चार चांद तब लगता है, जब हम स्वयं इसे सही मायने से जीते हैं और दूसरों को भी उसी तरह जीने देते हैं। स्वार्थवश हम अपने भौतिकता और विलासिता से भरी ज़िंदगी जीने की चाह में, जीवन भर भागते रहते हैं। इस भाग-दौड़ में हमें पता ही नहीं चलता कि हम किस अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं और यह रास्ता हमें किस अंधेरी राह की ओर ले जा रहा है। हम एक रास्ते से दूसरे रास्ते, दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे रास्ते पर बस बेतहाशा भागते ही रहते हैं, जिंदगी जीते नहीं, बल्कि जिंदगी काटते रहते हैं। हमारे जीवन में एक समय ऐसा आता है कि हमें अंतिम रास्ता पहले से ज़्यादा कठिन, दुर्गम और कंटीला नज़र आने लगता है। जीवन की उलझनों को सुलझाते-सुलझाते आखिरकार हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि हमारा पहला रास्ता ही सही और सुगम था। मगर अपने उसी पहले वाले रास्ते पर लौटने और फिर से वही ज़िंदगी पा लेने की चाह में हमारी ज़िंदगी का बेशकीमती समय हमारे हाथ से मुट्ठी से रेत की तरह निकल गया होता है। और, तब हमें एहसास होता है कि हम तो अब भी वहीं खड़े हैं , जहां से हमने कभी अपनी ज़िंदगी की दौड़ शुरू की थी। आज ज़िंदगी के कुछ ऐसे ही अनजाने और अनचाहे मोड़ पर हम सभी खड़े हैं, जहां से दूर-दूर तक हमें कोई रास्ता सूझ नहीं रहा है। बहुत ही कठिन समय है यह। पूरी दुनिया का हाल देखकर तो कुछ ऐसा ही लग रहा है। अर्थ-व्यवस्था तहस – नहस होने की कगार पर है। ऐसा लगने लगा है मानो इस दुनिया में कुछ भी शेष रहने वाला नहीं है, धीरे-धीरे सब कुछ खत्म हो रहा है। मतलब हम जहां से चले थे, लौट कर वहीं पर खड़े हो गए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ज़िंदगी की भागम-भाग में हमने कहीं रुक कर सोचने, समझने, विचार करने की जरूरत ही नहीं समझी। हम तो बस भागते रहे बिना सोचे – समझे। तभी तो शायद प्रकृति ने हमें एक बार फिर से कुछ देर थमने, अपनी पिछली भूलों को सुधारने, सार्थक विचार-विमर्श करने और कोई ठोस निर्णय लेने का मौका दिया है। ऐसे में जरूरत है आत्ममंथन की, आत्मविश्लेषण की और आत्मविवेचन की, क्योंकि हम सभी भली-भांति जानते हैं कि प्रकृति कभी किसी के साथ कोई भेदभाव, पक्षपात या अत्याचार नहीं करती, पर जब हम प्रकृति से अनावश्यक खिलवाड़ करते हैं, उसका दोहन करते चले जाते हैं, तब प्रकृति जरूर कुपित हो जाती है, जिसे वह समय-समय पर भूकंप, तूफान, बाढ़, महामारी आदि के रूप में अभिव्यक्त करते हुए हमें सचेत करती है, आगाह करती है और बारंबार चेतावनी देती है, लेकिन तब भी हम अपनी ही धुन में मस्त भागते रहते हैं। सब कुछ जानते हुए भी अनजान बन जाते हैं और नासमझ होने का ढोंग करते हैं।प्रकृति का आज के दौर में हमें सबसे बड़ा सबक यही है कि हम अपनी गलती की सजा के तौर पर अपने प्रिय व स्नेहिल परिवारजनों का, छोटे-बड़ों का अपार दुःख अपनी इन्हीं आंखो से देख रहे हैं। अपनी खोखली, तथाकथित विकासपूर्ण जिंदगी की जिद के आगे अपने मासूम बच्चों की खुशी की बलि चढ़ा रहे हैं। अपने बड़ों के स्नेह और आशीर्वाद से वंचित हो रहे हैं। हमारी अपनी इस जिद के बावजूद, पल भर में सारी मानव जाति का संहार करने की क्षमता रखने वाली, प्रकृति आज भी हमसे यह उम्मीद लगाए बैठी है कि हम सुधर जाएंगे ताकि हमारी ज़िंदगी एक बार फिर खूबसूरत बन जाए। प्राणियों में श्रेष्ठ होने के नाते हमारी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हम अपनी छोटी-बड़ी हर उस गतिविधि पर रोक लगाएं जिससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। ऐसा करने से हम स्वयं अपने लिए और आने वाली नई पीढ़ी के लिए एक खूबसूरत और सुरक्षित भविष्य दे पाएंगे। यह सब भौतिकता और विलासिता से भरपूर हमारी अपनी ज़िंदगी और ऐसी जिंदगी जीने की हमारी चाह पर निर्भर करता है।


