पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी व तणृमूल कांग्रेस पार्टी के बीच ’जय श्री राम“ को लेकर अंतर्युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। तृणमूल कांग्रेस पार्टी (टीएमसी) की सर्वेसर्वा संस्थापक अध्यक्षा ममता बनर्जी ने जो ’जय श्री राम“ का विरोध करना शुरु किया तो उसके पीछे उनका आरोप है कि भाजपा कार्यकर्ता उनके सामने ही ’जय श्री राम“ का नारा क्यों लगाते हैं, वह इस शब्द से ही नफरत करती हैं। यह अत्यन्त खेदजनक एवं आश्चर्य जनक है कि ममता को उर्दू का ‘नफरत’ शब्द मालूम है, किंतु संस्कृत का ‘उद्घोष’ शब्द उन्हें ज्ञात नहीं है? यह एक बंगाली हिन्दू परिवार में जन्मी ममता के लिए घातक विडम्बना ही कहा जायेगा। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ’जय श्री राम“ कोई नारा या स्लोगन नहीं भारतीय संस्कृति के निर्विवाद प्रतीक ‘श्री राम’ का उद्घोष और जयघोष है। उद्घोष शब्द संस्कृत का है तथा भारत भूमि की सभी आंचलिक भाषाओंके लोगों द्वारा अच्छी तरह समझा जाता है। यदि नारे व उद्घोष में ममता को कोई अंतर समझ में नहीं आता तो यह उनकी दुर्बलता है, न कि ’जय श्री राम“ का उद्घोष करने वाले भारतीय नागरिकों की। दो दर्जन राज्य भारत में ऐसे हैं, जहां ’जय श्री राम“ के उद्घोष को भारतीय संस्कृति का उद्बोधन माना जाता है। अकेले ‘ममता’ ’जय श्री राम“ का विरोध करके कर ही क्या सकती हैं।
’जय श्री राम“ एक ऐसा प्रभाव कारी शब्द है, जो भारतीय संस्कृति का युग – युगान्तरों में कुशल संवाहक रहा है। ममता बनर्जी का ’जय श्री राम“ का विरोध भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का विरोध है। यद्यपि कि भारत में सभी धर्मावलम्बियों को अपनी अवधारणाओंएवं परम्पराओंके अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। किन्तु यह इतनी भी नहीं कि वह भारतीय संस्कृति को ही विकृत करने का प्रयास करें। यहां यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि ‘पश्चिम बंगाल’ में ’जय श्री राम का उद्घोष“ करने वाले अधिकांश लोग बंगाली ही हैं। या एक – दो अन्य प्रान्तों से भी हो सकते हैं, कहीं विदेश से आयातित नहीं किये गये हैं। प्रश्न यह उठता है कि ममता बनर्जी विदेशी घुसपैठियों को भारत का नागरिक बनाने को तैयार हैं किन्तु अन्य प्रान्तों या पश्चिम बंगाल के ही भारतीय नागरिकों का विरोध कर रही हैं। उनका यह कहना कि मुझे यह पसन्द नहीं या वह पसन्द नहीं,मैं (वह) जो चाहती हैं वही हो, पश्चिम बंगाल के संबंध में कोई कुछ न बोले, यह तो एक जिद्दी (हठी) शासक की मानसिक विकृति ही कही जायेगी। सुप्रसिद्ध साहित्यकार अन्नपूर्णा देवी, ठा. रविन्द्रनाथ टैगोर एवं शर्तचंद्र चटोपाध्याय की भूमि में ऐसा कोई हठी शासक जन्म लेगा, इसकी तो कभी किसी ने परिकल्पना ही नहीं की होगी। टैगोर जी का रचित राष्ट्रगान ‘जन गण मन अधिनायक जय हे,’ या बंकिमचंद्र चटोपाध्याय रचित ‘वंदे मातरम्’ भारत के जन- जन ने राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत के रुप में अपनाया हुआ है। भारतीय लोकतंत्र में ममता जैसी हठी शासिका, अधिक समय तक नहीं रह सकती। वर्तमान में समूचा पश्चिम बंगाल ‘ममता बनर्जी’ की तानाशाही व गुंडा गर्दी से त्रस्त है, क्योंकि उतनी गुंडागर्दी व जन धन की हानि तो नक्सलवादियों ने भी नहीं की है। यदि वह भारत की मुख्यधारा से जुड़ कर अपने में सुधार नहीं लातीं तो पश्चिम बंगाल में ‘आपातकाल’ घोषित किये जाने की अनिवार्य परिस्थिति उद्भवित हो सकती है।


