सामाजिक तौर पर एक आदमी को उसकी मर्जी के विरुद्ध नाम से बुलाना गलत है। लेकिन सामंती मानसिकता के लोग मना करने पर भी ऐसा करते हैं, और पूरी ठसक से करते हैं। जया बच्चन ने खुद को `जया अमिताभ बच्चन’ कह कर बुलाए जाने पर आपत्ति जताई तो उन्हें दोबारा इस नाम से संबोधित नहीं करना चाहिए था।
और हठधर्मिता तो यह कि श्रीमती जया बच्चन के इस पर आपत्ति जताने पर डेकोरम का हवाला देकर उन्हें बोलने से ही वंचित करके अगले वक्ता को आमंत्रित कर दिया गया और और सारी कार्रवाई को भी रिकॉर्ड से बाहर कर दिया गया। जबकि हाल ही में प्रधानमंत्री ने उनके भाषण के दौरान संसद में बीच-बीच में हो रहे शोर को लेकर पर कहा था कि एक निर्वाचित प्रधानमंत्री के वक्तव्य के दौरान बार बार व्यवधान पैदा करके विपक्ष लोकतंत्र का गला घोंट रहा है।
आश्चर्य यह है कि अपने मामले में बार बार व्यवधान प्रधानमंत्री को लोकतंत्र का गला घोंटना लगता है पर एक महिला को उसकी मर्जी के विरुद्ध नाम से बार बार बुलाया जाना और बार-बार आपत्ति के बाद भी पुन: आपत्ति जताने पर उन्हें बोलने से ही वंचित कर देना बुरा नहीं लगता। राहुल गांधी को पप्पू और बालक बुद्धि जैसे सम्बोधन देकर जो मॉडल बनाया गया, जया बच्चन के मामले में भी कुर्सी ने उसी मॉडल को दोहराया है। यह देश का दुर्भाग्य है कि इस तरह का मॉडल कुछ लोगों के लिए आदर्श और आचरण बनता जा रहा है। कुर्सी पर बैठे लोगों ने अपनी सत्ता को अपने कर्म का वैलिडेशन मान लिया है, पर उन्हें ख्याल रखना होगा कि उन्हें भले ही बहुमत मिल गया हो, लेकिन ४०० पार के नारे से नीचे उतार कर लोगों ने उन्हें बता दिया है कि अनर्गल संवाद, अनर्गल नारे या अनर्गल सम्बोधन उन्हें पसंद नहीं।
सरकार और उनके नुमाइंदों को वे चाहे सर्वोच्च पद पर बैठे माननीय प्रधानमंत्री जी हों, या एकदम निचले पायदान पर बैठे पार्षद या दूसरे पदाधिकारी हों, उन्हें यह समझना होगा कि वे ही सरकार, वे ही लोकतंत्र, वे ही देश और वे ही व्यवस्था नहीं हैं । चाहे प्रधानमंत्री जी हों, या राज्य सभा के उप सभापति, या कोई और; वे सरकार, व्यवस्था, देश या लोकतंत्र की एक “छोटी सी” इकाई भर हैं . देश, व्यवस्था, सरकार और लोकतंत्र के सापेक्ष उनकी भी हैसियत सिर्फ उतनी ही है जितनी किसी अन्य की।
मिल-जुल कर रहना, सह अस्तित्व को स्वीकारना हमारी जरूरत भी है और मजबूरी भी और यह सबके लिए लागू होता है । दुर्भाग्यवश वर्तमान सत्तारूढ़ राजनीतिक विचारधारा अपने वैचारिक विरोधियों के प्रति इस तरह से असम्मान से भरी हैं कि माननीय प्रधानमंत्री जी भी मुख्य विरोधी दल कांग्रेस का इस देश से नामोनिशान मिटा देने का एक-दो बार नहीं, बार-बार आह्वान करते आये हैं। जातीय वोटों का सवाल न होता तो वे सपा-बसपा से लेकर हर क्षेत्रीय दल के लिए भी इसी तरह का उद्गार व्यक्त कर चुके होते।
यही और इसी तरह की विचारधारा पार्टी और सरकार को भी कुछ पसंदीदा व्यक्तियों के गिरोह में बदल देती है। मौजूदा राजनीतिक सत्ता को यह समझना ही होगा कि किसी की भी हैसियत इस मुल्क की चेतना से बड़ी नहीं , और लोकतांत्रिक व्यवस्था से परे आचरण करने पर उसके लिए हमेशा इस बात का खतरा बना रहेगा कि राष्ट्र कभी भी उसके कहे को ठुकरा सकता है। जो देखना चाहें, वे देख सकते हैं कि हाल के लोकसभा चुनाव के नतीजे जनता की तरफ से दी गयी एक चेतावनी ही रहे हैं।
फिलहाल, जया बच्चन के मामले में उप राष्ट्रपति महोदय के खिलाफ विपक्ष की और से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है । जाहिर है अब उस पर होनेवाली चर्चा में उन सारे पहलुओं की चर्चा होगी जिन्हें वे सख्ती से दबा देते हैं या रिकॉर्ड में नहीं लेते । यह सब अब रिकॉर्ड पर होगा। और खूब मुखर होकर होगा। यह एक अभूतपूर्व स्थिति है जिसके लिए उप राष्ट्रपति महोदय स्वयं जिम्मेदार हैं।


