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हिंदी दिवस पर राजभाषा सम्मेलन का औचित्य

 

राजीव रोहित (साहित्यकार  )       

पिछले पांच वर्षों से गृह मंत्रालय के तत्वाधान में हिंदी दिवस (14 सितंबर ) के पर दो दिवसीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन देश के अलग-अलग शहरों में आयोजित हुये हैं। पहला सम्मेलन वाराणसी में हुआ था और इस वर्ष यह नवी मुंबई में हो रहा है। इस अवसर पर भारत सरकार के कार्यालय, सार्वजनिक उपक्रमों एवं वित्तीय संस्थाओं के राजभाषा अनुभाग से जुड़े अधिकारी व कर्मचारी एकत्र होते हैं। सवाल यह है कि यह आयोजन हिंदी दिवस के अवसर पर देश भर के कार्यालय परिसर से बाहर क्यों आयोजित किये जा रहे हैं?

हिंदी 14 सितंबर 1949 को देश की राजभाषा घोषित हुई थी। यही वजह है कि इस तिथि को देश भर में हिंदी दिवस मनाने की परंपरा केंद्रीय सरकार के अधीनस्थ सभी प्रकार के छोटे-बड़े कार्यालयों में आरंभ हुई। प्रति वर्ष यह बड़े उत्साह से और धूमधाम से सरकारी कार्यालयों में मनाया जाता है। केवल हिंदी दिवस ही नहीं इसे और भी वृहद रूप में हिंदी सप्ताह या फिर हिंदी पखवाड़ा के रूप में विस्तार दिया गया। वर्ष 2020 तक तो यह ठीक था। 2021 से अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन की शुरुआत हुई। वर्ष 2022 के सम्मेलन के लिये नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के माध्यम से भीड़ जबर्दस्ती जुटायी गयी। प्रश्न यह है कि जमीनी स्तर पर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के नाम पर भारत सरकार के अधिकांश कार्यालयों के परिसरों में जो सन्नाटा छाया रहता है। उसके लिये कौन जिम्मेदार है? किसी न किसी प्रकार सम्मेलन स्थल पर पहुंचना उन अधिकारियों और कर्मचारियों के लिये कितना तकलीफ देह होता है यह वही जानते हैं। सम्मेलन में होता यह है कि केंद्रीय सरकार के कुछ मंत्री के साथ माननीय गृहमंत्री आते हैं। आयोजन स्थल में चारो ओर एलईडी कैमरे लगे होते हैं। ताकि उनका भाषण देश भर से आये हुये कार्यालय प्रधान और उनके राजभाषा अधिकारी सुन सकें। हिंदी के विकास से संबंधित लच्छेदार शब्दों को संप्रेषित करने के बाद अन्य अतिथियों के भाषण होते हैं। मेजबान राज्य के मुख्यमंत्री भी अपनी बात कहते हैं। सभी गणमानय अतिथियों की बड़ी-बड़ी बातों के बाद एकाध सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। फिर शुरु होता है कला,फिल्मों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े मेहमानों के भाषणों का दौर, जो पूरे दो दिनों तक चलता है। इसके बाद वो केवल प्रशंसक का अवतार ग्रहण कर लेते हैं। फोटो खिंचाने का उन्मादी दौर शुरु होता है। उस समय आयोजन स्थल पर चारो तरफ लगे कैमरे कोई देख लें तो चारो ओर एक खुशी की चीख-पुकार मचाते प्रशंसक नजर आयेंगे। स्टार भी अपने प्रशंसकों की फौज देखकर आपे से बाहर हो जाता है। अफरा-तफरी में यह सम्मेलन समाप्त होते हैं। बाहर से आये हुये अन्य राज्यों के केंद्रीय कार्यालयों के छोटे-बड़े अधिकारीगण शहर का भ्रमण करने के साथ-साथ जमकर खरीदारी भी करते हैं। सम्मेलन संपन्न होने के पश्चात अब यक्ष प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि वो क्या ग्रहण कर वापस अपने कार्यालय जा रहे हैं ? क्या यह जवाब उनके कार्यालय को संतुष्ट कर पायेगा कि वो हिंदी दिवस का उदघाटन अन्य किसी शहर में कर आये हैं। लोगों के मन में यह भी जिज्ञासा होगी कि माननीय गृह मंत्री का भाषण तो हिंदी दिवस के मौके पर कार्यालय परिसर में सबसे पहले पढ़ा ही जाता था फिर इसके लिये दूसरे शहर का दौरा क्यों किया गया? उक्त सम्मेलन में वित्त मंत्री की अनुपस्थिति के बारे में कोई नहीं पूछता क्योंकि पिछले चार वर्षॉ से वित्त मंत्री का अब कोई भाषण या संदेश इस मौके पर नहीं आता है। इसका कारण यह है कि वित्त मंत्री महोदया हिंदी में बोल तो सकती हैं मगर हिंदी को बढ़ावा देने का संदेश तैयार करने में दिलचस्पी नहीं लेती हैं। भले ही माननीय प्रधानमंत्री का हिंदी प्रेम अब वैश्विक आकार ले चुका है। किंतु एक कटु सत्य यह है कि वे अपने वित्त मंत्री द्वारा की जा रही हिंदी की उपेक्षा को नजर अंदाज कर देते हैं।

वस्तुत: इस राजभाषा सम्मेलन का सबसे घातक परिणाम यह होता है कि हिंदी दिवस के अवसर पर कार्यालय प्रधान और राजभाषा विभाग के अधिकारियों की उनके कार्यालय में अनुपस्थित होने पर सबसे पहले तो संवैधानिक हिंदी दिवस के उद्देश्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। उक्त कार्यालय के अन्य विभागों के कर्मचारीगण यहां तक सोचने लगते हैं कि शायद हिंदी दिवस मनाना बंद कर दिया गया है। मन मारकर अधिकारी यह बताते हैं कि हिंदी दिवस का उदघाटन तो माननीय मंत्री महोदय ने कर दिया है। अब वो अपने यहां हिंदी दिवस समापन समारोह मनायंगे।

सम्मेलन के नाम पर करोड़ों रुपये का खर्च क्या हिंदी को राष्ट्रभाषा का स्थान दिला पायेगा ?क्या हिंदी केवल सम्मेलन, दिवस, सप्ताह और पखवाड़े का माध्यम बनकर रह जायेगी? कुल मिलाकर राजभाषा हिंदी के दिवस के नाम पर हमेशा की तरह सम्मेलन ,उदघाटन और समापन संपन्न करने की परंपरा कितनी आवश्यक है? इसका असर क्या होता है ? उत्तर है वही ढाक के तीन पात…अर्थात कुछ नहीं होता और कुछ होने की संभावना भी नहीं है. तकनीकि रूप से इसकी जो वजह उभरकर सामने आती है वो यह है कि सभी स्तर के केंद्रीय कार्यालय की शाखायें या ईकाईयां भाषा के अनुसार देश के तीनों क्षेत्रों (क क्षेत्र-समस्त हिंदी भाषी राज्य,ख क्षेत्र- महाराष्ट्र, गुजरात पंजाब व अन्य केंद्र शासित प्रदेश एवं ग क्षेत्र- दक्षिण एवं पूर्वी भारत के समस्त राज्य) में है। हर क्षेत्र के लिये कामकाज के प्रतिशत निर्धारित किये गये हैं। कामकाज के प्रतिशत का यह निर्धारण हिंदी के विकास में बाधक है। कामकाज निर्धारण के कारण ही इन कार्यालयों के राजभाषा कामकाज का संतुलन एकरूप आकार नहीं ग्रहण कर पाता है। यहां अंग्रेजी फिर से भारी पड़ जाती है। नतीजा यह होता है कि हिंदी दिवस..सप्ताह..पखवाड़ा समापन के दूसरे दिन से ही हिंदी एक किनारे पर खड़ी होकर अंग्रेजी का बोलबाला देखती है और अनुवाद में उलझकर रह जाती है। यह हर हिंदी दिवस और पखवाड़ा के बाद की परंपरागत उदासीन स्थिति है।

आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी दिवस को वापस कार्यालय परिसर में ही मनाया जाये। ताकि हिंदी की कम से कम कार्यालयीन गरिमा वापस आ सके। और अब यह सम्मेलन क्या हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में सहायक सिद्ध हो सकती है? इसका उत्तर किसी के पास नहीं है..

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