मीरा रोड (सं. भा.) “सड़कें जब सूनी होती हैं, तब संसद आवारा हो जाती है।” डॉ. राममनोहर लोहिया का यह विचार लोकतंत्र में जनभागीदारी और जनसंघर्ष के महत्व को रेखांकित करता है। उनकी पुण्यतिथि से दो दिन पहले 10 अक्टूबर को मीरा रोड स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल के विरंगुला केंद्र में ‘समाजवादी आंदोलन एवं डॉ. राममनोहर लोहिया’ विषय पर व्याख्यान और विचार-विमर्श का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने लोहिया के जीवन, समाजवादी चिंतन, गांधीवादी विचारधारा और सामाजिक न्याय के लिए उनके संघर्षों पर प्रकाश डाला।
मुख्य वक्ता डॉ. अवधेश राय ने लगभग सवा घंटे के व्याख्यान में लोहिया के जन्मस्थान अकबरपुर से लेकर उनके राजनीतिक जीवन और संसद तक के सफर का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बाल्यकाल में बाल गंगाधर तिलक की अंतिम यात्रा में शामिल होने से लेकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और कलकत्ता में शिक्षा, जर्मनी में शोध तथा स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका जैसे प्रसंगों का उल्लेख किया। उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना, भारत छोड़ो आंदोलन, जेल यात्रा, गोवा और नेपाल की मुक्ति के प्रयासों तथा अंतरराष्ट्रीय मामलों में लोहिया के योगदान पर भी चर्चा की।
डॉ. राय ने संसद में लोहिया के विचारों, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ने, आम आदमी की आर्थिक स्थिति और महिलाओं के अधिकारों को लेकर उनके दृष्टिकोण की व्याख्या की। उन्होंने लोहिया के चौखंभा राज्य के विचार, लेखन और सामाजिक समानता के लिए किए गए संघर्षों को भी रेखांकित किया।
व्याख्यान के बाद हुई चर्चा में अधिवक्ता तीर्थराज सिंह ने सांप्रदायिकता से जुड़ा सवाल उठाया। इस पर हुई बातचीत ने विचार गोष्ठी को और सार्थक बनाया। अध्यक्षीय वक्तव्य में मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. हूबनाथ पांडेय ने कहा कि कोई भी विचार अपने आप में पूर्ण नहीं होता। गांधी, लोहिया और मार्क्स के विचारों में से जो बातें उपयोगी लगती हैं, उन्हें अपनाकर आगे बढ़ना चाहिए, जबकि अनुपयुक्त विचारों को छोड़ देना चाहिए। विचारों के क्षेत्र में सहमति और असहमति की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।
कार्यक्रम के आरंभ में स्वर संगम फाउंडेशन के अध्यक्ष हृदयेश मयंक ने डॉ. अवधेश राय को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। डॉ. हरिप्रसाद राय ने आभार व्यक्त किया, जबकि कार्यक्रम का संचालन शैलेष सिंह ने किया।


