यह सवाल आज हर कोई पूछ रहा है, मगर इसका जवाब किसी के पास नहीं। वैश्विक महामारी कोरोना जैसे – जैसे बढ़ रहा है, वैसे – वैसे लोगों की मुश्किलें भी बढ़ रही हैं। अन्य देशों की तरह इस महामारी से हमारा अपना भारत देश भी जूझ रहा है। दिन ब दिन इस महामारी से बढ़ते मरीजों की संख्या सरकार ही नहीं आम जन की भी चिंता का विषय है। भारत में 21 दिन के लॉकडाउन की अवधि 14 मार्च को समाप्त हो रही है। मगर जिस तरह से पिछले पांच दिनों में इस महामारी से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ी है, उससे नहीं लगता कि 14 मार्च के बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा। यह एक गंभीर विषय है। हमारे देश में रोज कमाने – रोज खाने वालों की संख्या बहुत अधिक है। जीविका विहीन ऐसे लोगों और उनके परिवारों का गुजर बसर कैसे होगा? ऐसा कब तक चलेगा? हालांकि केंद्र और राज्य सरकारें इसके लिए पूरी तरह तैयार हैं। कई गैर सरकारी संस्थानों ने भी ऐसे लोगों के भोजन आदि का व्यवस्था का इंतजाम किया है। फिर भी यह नाकाफी है। केवल अपना और अपने परिवार का पेट पाल लेना ही तो सब कुछ नहीं है न। बच्चों का भविष्य, उनकी पढ़ाई – लिखाई, उनका कैरियर, परिवार के अन्य सदस्यों की रोजमर्रा की जरूरतें और न जाने कितने तरह के काम और जीवन से जुड़ी बातें। इन सब को पूरा करने के लिए पैसों की आवश्यकता। कहां से पूरा होगा यह सब? सोचनीय अवश्य है। मगर इन सब के बीच सबसे बड़ी बात आज हम सब के लिए जो है, वह अपना और अपने परिवार का जीवन बचाने का है। कहा गया है कि जान है तो जहान है। इसलिए सभी चिंताओं, भविष्य की सारी आशाओं को छोड़ कर अपने और अपने परिवार को महफूज रखने की चिंता करें। इसीलिए तो भारत की चरमराती अर्थव्यवस्था को नजरअंदाज करते हुए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हमें यही मंत्र दिया है। घर में रहें महफूज रहें। लॉकडाउन के तहत घरों में बैठे लोग महामारी से उत्पन्न परिस्थिति के बारे में सोच – सोच कर परेशान हैं। लोगों को समझ नहीं आ रहा कि आखिर कब तक इस तरह घर में हाथ पर हाथ धरेे बैठना पड़ेगा। अपने – अपने घरों में पिछले कई दिनों से कैद लोगों को कुछ समझ नहीं आ रहा कि आखिर करें तो क्या करें। फिर भी भारतीय जन समुदाय में प्रत्येक परिस्थिति से उबरने का अदम्य साहस है। जो सराहनीय है। हमारे देश के लोगों में कठिन से कठिन परिस्थिति का डटकर मुकाबला करने का जो जज्बा है, वही अन्य देश के लोगों से उन्हें अलग करता है। राहत की एक बात जो दिखाई दे रही है, वह यह कि लंबी दूरी की ट्रेनों और एयर इंडिया को छोड़कर बाकी निजी हवाई सेवाओं ने आगामी 15-16 मार्च से बुकिंग शुरू कर दी है। इससे लगता है कि एकदम से तो नहीं, पर धीरे – धीरे लॉकडाउन में ढील की गुंजाइश है। सबसे बड़ी युवा जनसंख्या वाला हमारा देश आज जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है, उससे तो यही अनुमान लगता है कि अभी आने वाले कई दिन हम सभी के लिए कठिन हैं। जिनका हम सभी को धैर्य और साहस के साथ मुकाबला करना होगा, तब जाकर हम कोरोना जैसी भयानक महामारी से जीतने में सफल हो सकेंगे।


