जन्म और मरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । आज जीवन है तो एक दिन मृत्यु अवश्य ही आएगी । यही प्रकृति का शाश्वत नियम है। जन्म जीवन का प्रथम अध्याय और मृत्यु अंतिम अध्याय माना जाता है। इसी जीवन को हम सत्कर्मों से श्रेष्ठ और दुष्कर्मों से अपयश के भागी बना सकते हैं। जब इंसान मृत्यु को प्राप्त होता है तो अक्सर सुना जाता है कि वह कितना अच्छा था, सब की भलाई के लिए सदैव अग्रसर रहता था । इसके विपरीत दुष्कर्म करने वालों के लिए– अच्छा हुआ मर गया ,यह इसी के लायक था । यही हमारे साथ जाता है ।
मृत्यु के बाद आता है अंतिम संस्कार। सभी अपने स्वजनों की अंतिम विदाई सम्मान से करते हैं जिनके पास धन नहीं है वह भी उधार लेकर उन्हें सद्गति दिलाने के लिए उनकी अंत्येष्टि करता है । परंतु कोरोना काल में नदियों में शव तैरते देखे गए! उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया ,उन्हें ऐसे ही प्रवाहित कर दिया गया, जिन नदियों का जल हम पीते हैं उनमें शव बहाकर अशुद्ध कर रहे हैं । क्या यह उचित है?
ऋग्वैदिक काल से लेकर अथर्ववेद में सबको अंत्येष्टि स्थल तक बैलगाड़ी से ले जाने का उल्लेख है ।अंत्येष्टि कर्म का विधान वैदिक काल से भी प्राचीन है। शव को अग्नि में समर्पित करना ही मुख्य बताया गया है । कभी-कभी मृत्यु के बाद भी जीवन की निरंतरता बनी रहती है । मृत्यु के बाद भी मोह बना रहता है । अग्नि दाह के
समय जब हम अपने प्रियजन को अग्नि देते हैं तो मृत आत्मा मोह से मुक्त होती है और परिवारजन भी । परिवार तो उसकी यादों से हमेशा जुड़ा रहता है लेकिन आत्मा मोह से मुक्त हो जाती है। अंत्येष्टि के लिए प्रकृति का दोहन निरंतर हो रहा है जिससे पृथ्वी का ताप बढ़ रहा है ,भूकंप आ रहे हैं ,जीव नष्ट हो रहे हैं, अनेक वनस्पतियों की प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं ,पानी का संकट गहरा रहा है, नदियों की स्थिति भयावह हो रही है ,जैव विविधता नष्ट हो रही है, वायु प्रदूषण से हाहाकार मच रहा है, कोरोना का कहर सबसे जानलेवा हो रहा है। मनुष्य भी बदल रहा है। सब कुछ परिवर्तनशील है तो अंत्येष्टि जैसे कर्मकांड में भी परिवर्तन संभव है।
अंत्येष्टि के लिए कितने वृक्ष काटे जाते हैं यह विचारणीय है, क्योंकि वन क्षेत्र सीमित हैं, वनों में स्वयं आग लग रही है, जो वन बचे हैं वे निरंतर कट रहे हैं ।क्या इसी प्रकार प्रकृति का दोहन होता रहेगा। धरा सिसक रही है, जल रही है, तभी तो आए दिन भूकंप आते रहते हैं । इन सब का विकल्प तो सोचना होगा । कोरोना काल में इतनी मृत्यु हुईं कि लकड़ियां कम पड़ गईं । दूसरे स्थानों से लकड़ियाँ मंगाई गईं । क्या यह उचित है? इस तरह से तो एक दिन पृथ्वी वृक्ष विहीन हो जाएगी । इसके बारे में जल्दी ही नहीं सोचा गया तो प्रलय आने से कोई नहीं रोक सकता । हमें इसके दूसरे विकल्प भी खोजने होंगे। गाय के गोबर से बने उपले इसका सुंदर विकल्प है। इससे एक तो उनका उपयोग होगा दूसरी ओर इनका धुआं पर्यावरण को किसी भी रूप में क्षति नहीं पहुंचाएगा । एक विकल्प और भी है विद्युत शवदाह गृह बनाए जाएं , इससे शायद हर कोई संतुष्ट ना हो, लेकिन इससे कम पैसों में भी अंत्येष्टि संभव है । शव को दफनाना भी एक विकल्प है जो मुस्लिम समाज में देखा जाता है लेकिन इसके लिए भी जमीन रुपी संसाधन चाहिए ।समय और परिस्थिति की मांग है कि इस ओर ध्यान आकृष्ट किया जाए । गोष्ठियां की जाएं ,जागरूकता अभियान चलाया जाये और शीघ्रतिशीघ्र समाधान निकाला जाए, जिससे प्रकृति को विनष्ट होने से बचाया जा सके।
-नन्दिनी रस्तोगी नेहा‘ मेरठ


