विपक्ष और बीजेपी, दोनों संविधान पर एक-दूसरे को कोस रहे हैं। विपक्ष बीजेपी से संविधान को खतरा बता रहा है तो बीजेपी विपक्ष को संविधान का हत्यारा बताती है। दोनों एक-दूसरे से संविधान की रक्षा का संकल्प ले रहे हैं। ऐसे में संविधान मानो चुनावी रामायण की सीता बन गई है, जिसके हरण के लिए रावण मौके की तलाश में है। इस वर्ष पहली बार संविधान अमेरिका की तरह ही भारत में भी चुनावी राजनीति की चर्चा का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। इस साल चुनाव शुरू होने से एक हफ्ता पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें कहा गया था कि संविधान को मनुस्मृति पर आधारित दूसरे संविधान से बदलने की गुपचुप योजना चल रही है, ‘जिसे बाबा साहब अंबेडकर भी खत्म नहीं कर पाए’। अगले दिन अंबेडकर की 133वीं जयंती पर ऑनलाइन मीडिया स्पेस कांग्रेस से लेकर आम आदमी पार्टी (आप) तक, विपक्ष के सभी दलों की ‘संविधान बचाओ’ अपील से भर गए। वीडियो फर्जी निकला, लेकिन इसने जो संदेह पैदा की वह जमीन नहीं छोड़ रही है। पक्ष-विपक्ष की खींचतान पर गौर करें तो संविधान भारत के इस चुनावी महागाथा की ‘सीता’ जान पड़ती है जिसकी एक-दूसरे से रक्षा की कसमें हर कोई खाता दिख रहा है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले महीने बिलासपुर में संविधान की एक प्रति लहराते हुए जोर दिया कि कांग्रेस का दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और गरीबों के प्रति यह पवित्र कर्तव्य है कि वह भाजपा से संविधान को बचाए। बदले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर भारत के संविधान (और इसकी पहचान और पारिवारिक मूल्यों) से ‘नफरत’ करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने संविधान की आत्मा के खिलाफ एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण को धार्मिक अल्पसंख्यकों को सौंपने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी और वो अब भी यही करने की तैयारी में है। प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस का यह कदम ऐसा है जिसने बाबा साहेब अंबेडकर को चौंका दिया होगा। कन्हैया कुमार विपक्ष को इस रूप में पेश कर रहे हैं, ‘हम ही हैं संविधान के असली पहरेदार’। वहीं भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा मतदाताओं को आश्वस्त करने में व्यस्त हैं कि मोदी सरकार, संकल्प रहित और मुद्दा विहीन विपक्ष की तुलना में संवैधानिक अधिकारों और मूल्यों की रक्षा करने में बेहतर स्थिति में है।आखिरकार, मोदी सरकार ने ही 2015 में घोषित किया था कि 26 नवंबर को भारत के संविधान दिवस के रूप में मनाया जाएगा। संभवतः संविधान में वर्णित आरक्षण व्यवस्था को संशोधित करने के आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के सुझाव पर मचे बवाल से नजर हटाने के लिए सरकार ने यह तुरुप का पत्ता फेंका। यद्यपि संविधान, अभी पार्टी प्रमुखों के लिए एक नया चुनावी खिलौना बन गया है। पिछले एक दशक में यह देशभर में विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों में झंडे के तौर पर लहराता रहा है। 2017-18 में झारखंड में आदिवासी भूमि की रक्षा के लिए पथलगड़ी आंदोलन चला। तब कई मुंडा गांवों के प्रवेश द्वार पर 15 फीट के पत्थर के स्लैब स्थापित किए गए थे। इन पर संविधान के वचन अंकित थे। 2019 में जेएमएम ने संविधान का हवाला देकर झारखंड में सरकार बनाई और आदिवासियों के लिए सरना धर्म को मान्यता दिए जाने की मांग की। 2019-20 में सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वालों, खास तौर पर शाहीन बाग के लोगों ने भी संवैधानिक मूल्यों का हवाला दिया। जाट, मराठा, गुर्जर और हाल ही में राजपूत समुदायों के किसान युवाओं ने भी आरक्षण की मांग से संविधान सुर्खियों में ला दिया है। पिछले एक दशक में अलग-अलग समुदायों की तरफ से आरक्षण के लिए आंदोलनों ने उत्तर भारत को हिलाकर रख दिया। महाराष्ट्र में अंबेडकरवादी महार नव-बौद्धों का एक संप्रदाय 26 नवंबर को अपने बौद्ध विहारों में संविधान के प्रस्तावना दिवस के रूप में मना सकता है, क्योंकि वह अपने नेता के नाम पर नारा लगाता है, ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य।’ लेकिन अधिकांश भारतीय नागरिकों की जुबान पर संविधान नहीं है। अनपढ़ ग्रामीण से लेकर शिक्षित शहरी निवासियों तक अपने राज्य या केंद्र सरकार या प्रशासन के बारे में कहने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन दुनिया के सबसे लंबा संविधान के बारे में वो कुछ खास नहीं जानते। यह एक ऐसा रहस्यमय विषय है जिसे वकीलों और न्यायाधीशों के लिए छोड़ देना ही बेहतर है। ग्रामीण कार्यकर्ताओं की एक नई पीढ़ी ने इसे बदलने का बीड़ा उठाया है।


