लोक सभा चुनाव – २०१९ सम्पन्न होने को है किंतु अभी से कुछ गंभीर बाते भारत के नागरिकों के लिए छोड़ता जा रहा है। प्रथम तो यह कि राजनीति में कोई दोस्त – दुष्मन नहीं होता। यह सिद्धान्त तो अत्यन्त उत्कृष्ट है. यदि सभी राजनेता या राजनैतिक दल इस तथ्य को अपने दिलों में जज्ब करलें ! वास्तव में प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में किसी प्रकार की वैमनस्यता नहीं होनी चाहिए क्योंकि राजनीतिक विरोधी वैचारिक होता है तथा इसमें राजनेताओंका कोई निजी हेतु नहीं होता। जो भी होता है, वह राष्ट्र की एकता – अखण्डता, शक्ति, समृद्धि एवं विकास के लिए होता है। इसका ताजा तरीन उदाहरण उ.प्र. की समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन है, जो देश में एक नया वैचारिक चिंतन दे गया है। लगभग तीन दशकों से निजी स्वार्थों से प्रेरित दोनों पार्टियां एक दूसरे की वैचारिक प्रतिस्पर्धी कम एक युद्ध क्षेत्र के दो पक्ष बने हुए थे। एक – दूसरे पर तीखी – आलोचनाएं करने वाले अपने निजी स्वार्थों की सिद्धि के लिए एक साथ जरुर आये हैं, किंतु यह कहना मुष्किल है कि दोनों ही दलों के दिल मिले होंगे। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि भाजपा के तूफान से बचने तथा उसे रोकने के लिए गठबंधन का रास्ता अख्तियार करना उनके लिए समय की मांग थी ताकि वे एक – दूसरे के मतों के सहयोग से उ. प्र. की ३० सीटों पर कब्जा कर लें। किंतु वे कितने सफल होंगे यह तो भविष्य ही बतायेगा? किंतु बचाव के लिए कोई भी अच्छा – बुरा तरीका अपनाये जाने का संदेश इस चुनाव में जरुर मिला है।
कहने को तो प्रजातंत्र का चुनाव महांपर्व होता है, जहां राष्ट्र – देश हित के लिए जनता अपनी अपेक्षाओंको ’मत“ के रुप में अर्पण करती है किंतु यदि प. बंगाल के लोकसभा चुनाव की समीक्षा की जाये, तो ’मतदान“ में होने वाले हिंसाचार को देखते हुए चुनाव को लोकतंत्र का पावन महापर्व न कहके यदि निकृष्ट विनाश पर्व कहा जाय तो ज्यदा सटीक होगा। प. बंगाल की मुख्यमंत्री की पार्टी ’तृणमूल कांग्रेस“ के नेताओंएवं कार्यकर्ताओंएवं विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओंमें झड़पे होना तो आम बात रही है, तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा ग्रेनेड हमले, छुरेबाजी, मारपीट, वाहनों एवं अन्य संपत्तियों की तोड़फोड़, मीडिया कर्मियों एवं विपक्षी उम्मीदवारों पर किये जाने वाले हमले यह बताते हैं कि प. बंगाल में यदि चुनाव न कराया जाय और ममता बनर्जी को आजीवन मुख्यमंत्री घोषित कर दिया जाय तो शायद ही कोई हिंसाचार हो! मीडिया रिपोर्टों एवं एवं राजनैतिक चिंतको के विश्लेषणों से पता चलता है कि प. बंगाल में भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से ममता बनर्जी को अपना सिंहासन हिलता प्रतीत होता है, जिससे वे घबरायी हुई हैं तथा भाजपा के प. बंगाल में प्रचार –प्रसार को रोकने के लिए, हर तरह के बल – प्रयोग व हिंसा चार पर उतर आयी हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों एवं अवैध बांग्लादेशियों सहित तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओंको खुली गुंडागर्दी व दहशत फैलाने की छूट दे दी हैं। ममता बनर्जी के हिंसाचार के चलते प. भंगाल की स्थिति जम्बू – कश्मीर से भी बद्तर हो गई है। प. भंगाल को अपनी पुश्तैनी मिल्कियत समझने की भूल करने वाली ‘ममता’ की शासन – प्रणाली से ‘अलगाववाद’ की ‘बू’ आती है। वहां की पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी भी भारतीय संविधान की उपेक्षा कर ममता के आदेशों के गुलाम हो गये हैं। क्योंकि उन्हे जनता को लूटने – खसोटने की छूट एवं संरक्षण ‘ममता’ ने दे रखा है। यह भारत के लिए चिंतन का गंभीर विषय बना हुआ है।


