भारत ने चीन के सबसे मजबूत किले यानि सौर ऊर्जा सेक्टर को अंदर से भेद दिया है। ये एक ऐसी कामयाबी है जिसका जश्न मनाया जाना चाहिए। चीन पिछले कई दशकों से दुनिया के सौर ऊर्जा बाजार पर एकतरफा राज कर रहा है, जहां वैश्विक स्तर पर 80% से ज्यादा सोलर पैनल और कंपोनेंट वही बनाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी नीतियों के दम पर चीन के इस अभेद्य साम्राज्य को हिलाकर रख दिया है। खास बात ये है कि चीनी सोशल मीडिया पर तहलका मच गया है और पहली बार चीनियों के बीच चर्चा हो हो रही है कि वो पिछड़ गये हैं। दरअसल पिछले कुछ दिनों से चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस बात की चर्चा जोरों पर है कि भारत चीन से उसका सौर ऊर्जा कारोबार ‘छीन’ रहा है। इस बार यह मामला फोटोवोल्टिक सेक्टर का है। भारत की फोटोवोल्टिक मॉड्यूल बनाने की क्षमता 2018 में 10 जीडब्ल्यू से भी कम थी जो 2026 तक बढ़कर 172 जीडब्ल्यू हो गई है और यह दुनिया की सालाना इंस्टॉलेशन क्षमता के लगभग बराबर है। यानी आठ सालों में इसमें 17 गुना बढ़ोतरी हुई है। वहीं दूसरी तरफ चीन में बड़ी फोटोवोल्टिक कंपनियों को 2023 की चौथी तिमाही से ही भारी नुकसान हो रहा है जो कुल मिलाकर अरबों युआन तक पहुंच गया है। ये कंपनियां इतिहास के सबसे बड़े नुकसान के दौर से गुजर रही हैं। चीनी सोशल मीडिया पर स्टालिनग्राद का हवाला दिया जा रहा है और कहा जा रहा है कि भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है। दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध में ‘स्टालिनग्राद की लड़ाई’ वह मोड़ थी जहां से शक्तिशाली जर्मन सेना की हार शुरू हुई थी और उसका विजय रथ रुक गया था। चीनी सोशल मीडिया पर इस शब्द का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया जा रहा है कि सौर ऊर्जा क्षेत्र में चीन की अजेय बढ़त अब खत्म हो रही है और भारत इस गिरावट की मुख्य वजह बन रहा है। ओआरएफ की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में चीन की 15 पीवी कंपनियों में से 11 ने कुल मिलाकर लगभग 50 अरब युआन के नुकसान की जानकारी दी है। पांच प्रमुख कंपनियों को 28 अरब युआन से ज्यादा का नुकसान हुआ है। चीनी लोगों का मानना है कि हालात में आए इस बड़े बदलाव का सीधा संबंध चीन से कथित टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से है और चीनी कंपनियों की ‘दुश्मन की मदद करने’ के लिए कड़ी आलोचना की गई है। ओआरएफ की रिपोर्ट के मुताबिक चीनी फोटोवोल्टिक इंडस्ट्री के लोग उन दिनों को याद करते हैं जब चीन और भारत की फोटोवोल्टिक कंपनियों के बीच रिश्ता काफी सीधा-सादा था। चीन सामान बनाता था और भारत उसे इस्तेमाल करता था। साल 2000 से 2015 के बीच भारत में चीन का कुल निवेश सिर्फ 1.24 अरब अमेरिकी डॉलर था जो भारत में हुए कुल ग्लोबल निवेश का 0.5 प्रतिशत से भी कम था। चीन के लिए भारत उसके उत्पादों का सिर्फ एक खरीदार देश था लेकिन चीन के अनुमानों के मुताबिक मेक इन इंडिया के बाद स्थिति तेजी से बदली है। भारत के ‘अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ़ मॉडल्स एंड मैन्युफ़ैक्चरर्स’ सर्टिफ़िकेशन ने भारत को सोलर ऊर्जा बाजार में तेजी से आगे बढ़ाया है। भारत की मॉड्यूल बनाने की क्षमता में भारी बढ़ोतरी हुई है और इसके साथ ही चीन से भारत को होने वाला फोटोवोल्टिक मॉड्यूल का सीधा निर्यात काफी कम हो गया है। चीन से भारत को होने वाला सोलर मॉड्यूल का सीधा निर्यात भारी मात्रा में सिकुड़ गया है। यह साल 2020 के 8.2 जीडब्ल्यू से घटकर 2025 तक मात्र 2.1 जीडब्ल्यू रह गया है। चीनी विश्लेषक हैरान हैं कि जो भारत कभी चीनी सोलर प्रोडक्ट का सबसे बड़ा खरीदार हुआ करता था वह आज वैश्विक बाजारों जैसे अमेरिका और यूरोप में चीन का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी बनकर खड़ा हो गया है। चीनी जानकारों का कहना है कि ऐसा तीसरे देशों के बाजार में भारत से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण हो रहा है। इसलिए चीन इस दावे से नाराज है कि भारत चीनी पूंजी, उपकरणों, तकनीक और इंजीनियरों का इस्तेमाल करके एक ऐसा उद्योग खड़ा कर रहा है जो असल में चीन को ही चुनौती देता है। ज्यादातर चीनी जानकारों का मानना है कि चीनी फोटोवोल्टिक कंपनियां जोखिम के बावजूद भारत को उपकरण बेचना जारी रखती हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि उनमें रणनीतिक दूरदर्शिता की कमी है बल्कि इसलिए है क्योंकि उनके पास बहुत कम विकल्प हैं। चीनी कंपनियों की मुश्किल की मुख्य वजह इस क्षेत्र में चीन की बहुत ज्यादा उत्पादन क्षमता है। रिपोर्ट के मुताबिक इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाले बाजार में जहां घरेलू उत्पादन बढ़ाने की बहुत कम गुंजाइश है और निर्माता ऑर्डर में भारी गिरावट का सामना कर रहे हैं भारत से मिलने वाले ऑर्डर इन कंपनियों के लिए असल में जीवन रेखा की तरह हैं।


