पृथ्वी मात्र सूर्य के चारों ओर मंडराता औसत ग्रह नहीं, बल्कि सभी जीवों को प्रश्रय, पोषण प्रदान करती अस्मिता है। युगों-युगों से यह धरती प्राणियों, जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों का भार वहन करती आ रही है। पहले मनुष्य प्रकृति को अपना मानकर उसकी देखरेख करता था, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखता था। लेकिन जैसे-जैसे मनुष्य की बुद्धि का विकास होता गया, वह प्रकृति के रहस्यों को समझने लगा, उसने प्रकृति का दोहन करना शुरु कर दिया। प्रकृति को नियन्त्रित कर, अपने को स्वामी मान उसे अपने अनुकूल चलाने लगा। उसकी लोभ-वृत्ति बढ़ती गई और प्रकृति का दोहन होता गया।
हमारी धरती आज जिस स्थिति में है, उसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं। स्वार्थ की आंधी में जिसे जो मिल रहा है, वह उस पर अपना अधिकार जमा रहा है। विकास के नाम पर वन, पर्वत, पठार, मरुस्थल, झील, सरोवर, नदी और समुद्र जैसी भौतिक रचनाओं को ध्वस्त करते हुए मनुष्य के हस्तक्षेप पारिस्थितिकी के संतुलन को बार-बार छेड़ रहे हैं, जिसका परिणाम अतिवृष्टि, अनावृष्टि, तूफान, भूस्खलन, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिसके चलते जैव विविधता घट रही है, जीव-जन्तुओं की प्रजातियां समाप्त हो रही हैं। गर्मी, जाड़ा, बरसात की अवधि खिसक रही है, जिसका असर हमारे जीवन क्रम पर पड़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो शहर के शहर डूब जायेंगे, उनका नामोनिशान तक नहीं रहेगा।
जाने-अनजाने हम ऐसे कार्य कर रहे हैं, जो वायुमण्डल को प्रभावित कर रही है। धरती के संसाधनों के दोहन को देखा जाये तो भेद इतना ही है कि यदि जर्मनी और अमेरिका की तरह सभी देश उपभोग करने लगे तो यह धरती कम पड़ जायेगी। आज पेड़ कट रहे हैं… उनकी जगह बड़ी-बड़ी इमारतों ने ले ली। जीवन की प्रक्रिया से इस तरह का खिलवाड़ करना क्षमा योग्य नहीं है। पर्यावरण की जिम्मेदारी किसी अकेले की नहीं, समाज की होती है और लोग उसे सरकार पर थोप देते हैं। विकास की दौड़ में हर कोई भाग रहा है बिना कुछ सोचे।
यदि आपको अपने परिवार से, समाज से, देश से प्यार है तो धरती की पुकार सुननी होगी और उसकी रक्षा अपनी माँ की तरह करनी होगी। प्रकृति संजीवनी है जीवन की रचयिता है। उसकी रक्षा करना सभी मनुष्यों का कर्त्तव्य है। प्रकृति के हितों की रक्षा हेतु समाधान अभी नहीं निकला तो बहुत देर हो जायेगी। भावी पीढ़ी के लिये हम धरती को वैâसा छोड़कर जा रहे हैं, जरा सोचिये?
धरती को बचाने के लिए आज से और अभी से पहल करें वह भी स्वयं से—जल संरक्षण करें, कम से कम केमिकल का उपयोग करें, हानिकारक कूड़े को सही तरीके से डिस्पोज करें। बिजली का उपयोग कम करें, पैदल चलें, वाहनों को कम चलायें, वृक्षारोपण करें, वृक्षों को काटने से बचायें, भूमि खनन को रोके, जीव-जन्तुओं की रक्षा में मदद करें, सौर ऊर्जा का उपयोग करें।
तो आइये, संकल्प लें कि आज ही एक वृक्ष लगायेंगे और धरती को सुरक्षा प्रदान करेंगे।
—नन्दिनी रस्तोगी ‘नेहा’, मेरठ


