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हिंदी साहित्य में प्रकृति

प्रकृति-सौंदर्य ईश्वरीय सृष्टि की अलौकिक, असीम और विलक्षण कला का एक अद्भुत नमूना है। सभी प्रकार के सौंदर्य का मूल स्रोत प्रकृति ही है। मनुष्य सौंदर्य का उपासक है। सौंदर्य दर्शन उसका सहज स्वभाव है। प्रकृति की रमणीयता हर एक को अपनी ओर आकर्षित करती है। प्रकृति के अनुपम और असीम सौंदर्य के प्रति साहित्यकार भी सहज रूप से आकर्षित होता है। हिंदी साहित्य के आदिकालीन साहित्यकारों से लेकर आधुनिककालीन साहित्यकारों ने साहित्य में प्रकृति चित्रण किया। साहित्यकारों ने प्रकृति के आलंबन, उद्दीपन, पृष्ठभूमि निर्माण, अलंकार, मानवीयकरण, रहस्यात्मक, उपदेशात्मक, प्रतीकात्मक आदि विभिन्न स्वरूपों का प्रयोग किया। और, इन स्वरूपों के माध्यम से परिस्थितियों और अपने निजी दृष्टिकोणों के आधार पर मानव जीवन से संबंधित विचारों और भावों को स्पष्ट अभिव्यक्ति दी। संपूर्ण हिंदी साहित्य में प्रकृति का अत्यंत संवेदनशील स्वरूप कवियों की भाव-भंगिमाओं के साथ उभरा है। भावों की भव्यता, अलंकारों की आलंकारिकता और रसों की सरसता प्रकृति-चित्रण की विशेषता रही है। इसके चलते, मानव और प्रकृति के बीच एक तरह का सामंजस्य स्थापित हुआ है। प्रकृति और मानव के बीच घनिष्ठ संबंध है, जो अटूट हैं, शाश्वत है। परंतु, स्वभाव से प्रकृति और मानव दोनों ही परिवर्तनशील हैं, इसलिए दोनों के बीच का रिश्ता भी निरंतर गतिमान, चलायमान रहता है, जिसके चलते साहित्य में भी प्रकृति विभिन्न रूपों में प्रस्तुत हुई है। वैदिक साहित्य, उपनिषद और भारतीय सांख्य दर्शन में प्रकृति को एक शाश्वत चेतन सत्ता माना गया है। और, साहित्य में प्रकृति स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों में प्रकट हुई है। आदिकालीन साहित्य में प्रकृति-चित्रण की प्रधानता रही, लेकिन प्रकृति के प्रति स्वाभाविक अनुराग कम रहा। इस युग में प्रायः सभी प्रकृति-चित्रण अप्रस्तुत विधान और उद्दीपन के अंतर्गत आते हैं। भक्तिकालीन साहित्य में प्रकृति का स्थान प्रायः गौण रहा। इस काल में प्रकृति-चित्रण प्रसंगानुरूप और आदर्श शब्दों के प्रयोग के कारण संयमित भी रहा। रीतिकालीन साहित्य में शृंगार रस की प्रधानता होने के कारण प्रकृति का प्रयोग उद्दीपन और अलंकार रूप में हुआ है। और, अधिकांश प्रकृति-वर्णन षड्ऋतु और बारहमासा पद्धति के अनुसार हैं। भारतेंदु युगीन साहित्य के प्रकृति-चित्रण में एक ओर जहाँ नई चेतनापरक दृष्टि है, वहीं दूसरी ओर पुरानी परिपाटी का चित्रण भी है। द्विवेदी युग के साहित्य में देश-प्रेम से युक्त प्रकृति-चित्रण है। इस युग के साहित्य में प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति का संवेदनशील अंकन है। संयोग-वियोग पक्ष में मर्यादा का पालन और आदर्श का निर्वाह है। प्रकृति-चित्रण में स्थूलता और कल्पना-वैभव का अभाव होते हुए भी नवीनता और यथार्थता का समावेश है। छायावाद युगीन साहित्य में प्रकृति का विशद और यथार्थ चित्रण हुआ है। इस युग में कवि और प्रकृति दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। प्रगतिवादी साहित्य में प्रकृति का वर्णन जीवन के संदर्भ में प्रस्तुत हुआ है। प्राकृतिक वर्णनों के माध्यम से सामाजिक संघर्ष के चित्रों को उभारा गया है, जो कि यथार्थ और जीवन-सापेक्ष हैं। प्रयोगवादी साहित्यकारों ने अपनी भावनाओं को बौद्धिक ढंग से व्यक्त किया है। उन्होंने प्रकृति का उपयोग बहुधा युगीन यथार्थ और मनोभावों को प्रकट करने के लिए किया है। नयी कविता में प्रकृति चित्रण के परंपरागत और नव्यतर दोनों ही रूप हैं। आधुनिकोत्तर साहित्यकारों ने प्रकृति का कल्पनारंजित और आलंकारिक वर्णन छोड़कर उसका यथातथ्य तटस्थ चित्रण किया है। उन्होंने जीवन की विडंबनाओं, समस्याओं और युग-संवेदना को प्रकृति के माध्यम से ज्वलंत अभिव्यक्ति दी है। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने में वृक्षों और वनस्पतियों का महत्वपूर्ण योगदान है। विकास के नाम पर मनुष्य प्रकृति से छेड़छाड़ कर रहा है। उसका संतुलन बिगाड़ रहा है। प्रकृति की रक्षा करने की बजाय वह उसका विनाश कर रहा है। इस दोहे में यह पीड़ा साफ झलकती है- बरगद, पीपल, नीम को, काट ले गए लोग। हवा भी जहरी हो गई, फैला जहरी रोग ।। हिंदी साहित्यकारों ने अपने साहित्य के माध्यम से सदा ही प्रकृति की महत्ता को दर्शाया। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों और तथ्यों को उजागर किया। प्रकृति संरक्षण के प्रति जनजागृति लाने और प्रकृति चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उन्होंने सौंदर्य और प्रकृति में पारस्परिकता दर्शाते हुए यह बताया कि- सौंदर्य ही प्रकृति है, और प्रकृति ही सौंदर्य है।

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