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हिन्दी शिक्षा की आवश्यकता

किसी भी भाषा के प्रचार-प्रसार का प्रमुख साधन है, भाषा शिक्षा। जिसके लिए विभिन्न प्रकार की सुविधाओं की आवश्यकता होती है। लेकिन भाषा शिक्षा के लिए सबसे अधिक आवश्यक है उसकी माँग। माँग तभी होगी जब किसी प्रयोजन के लिए उसकी आवश्यकता होगी। यदि भाषा के शिक्षण -प्रशिक्षण की सभी सुविधाएं उपलब्ध हों या उपलब्ध करवा दी जाएँ, तो भी तब तक बात नहीं बनेगी जब तक कि विद्यार्थी उस भाषा को सीखने के लिए उत्सुक न हों। कोई व्यक्ति कोई भाषा सामान्यत: तभी सीखता है जब उस भाषा का सीखना आवश्यक हो या उस भाषा को सीखने की आवश्यकता हो। स्वतंत्रता के समय जब भारतीय भाषाओं में शिक्षा की बात की गई तो उस समय यह कहा गया कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में शिक्षा के लिए पर्याप्त पाठ्य सामग्री और पाठ्यपुस्तकें ही उपलब्ध नहीं हैं तो पढ़ाई कैसे होगी? विदेशों में हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी शिक्षा का अधिकाधिक प्रसार हो। हिंदी-शिक्षा का प्रसार दो स्तरों पर आवश्यक है। पहला है भारत में हिंदी शिक्षा और हिंदी माध्यम से शिक्षा और दूसरा विदेशों में अथवा विदेशियों को हिंदी शिक्षा। विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार और प्रयोग को बढ़ाने के लिए अब हिंदी शिक्षा के पहले पक्ष पर विचार किए जाने की आवश्यकता है। प्रश्न उठ सकता है कि जब विदेशों में हिंदी बढ़ाने की बात है तो देश में हिंदी पढ़ाने या बढ़ाने की बात कहाँ से आ गई?  यदि आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो यह समझ आ जाएगा कि विदेशों में जितने भी हिंदी जानने वाले या प्रयोग करने वाले हैं उनमें से अधिकांश की जड़ें तो भारत में ही हैं। विदेशों में हिंदी जानने वाले मुख्यतः दो वर्गों के लोग हैं। पहले जिन्हें हम गिरमिटिया के वंशज कहते हैं, यानी वे लोग जिन्हें अंग्रेज भारत से मजदूर बना कर ले गए थे, उनके वंशज। ये भारतवंशी लोग जो सदियों पूर्व भारत से गए, उनके वंशज आज भी धार्मिक-आध्यात्मिक कारणों या अपने पूर्वजों की मातृभूमि से लगाव के कारण हिंदी का दामन थामे हुए हैं। ऐसे देशों में निश्चित रूप से फीजी एक बहुत बड़ा नाम है। इनकी जड़ें भले ही थोड़ी पुरानी हो लेकिन अंततः भारत भूमि में ही हैं। दूसरा उन भारतीय प्रवासियों का बहुत बड़ा वर्ग है जो पिछले करीब 100 वर्षो के अंदर रोजी-रोटी, व्यापार-रोजगार आदि के कारण विदेशों में गया है। वहाँ भी हम यह पाते हैं कि उनकी वह पीढ़ी जो भारत में पली-बढ़ी, जिनकी मातृभाषा हिंदी रही या जो हिंदी में पढ़े लिखे, वे विदेशों में जाकर भी हिंदी से जुड़े हुए हैं। विदेशों में बैठ कर भी हिंदी  की अलख जगा रहे हैं। हालांकि उनकी दूसरी तीसरी पीढ़ी तक आते-आते मातृभाषा की यह नमी सूखने लगती है। अब भारत से विदेशों में जाने वाले लोग यदि यही अपनी मातृभाषा में नहीं पढ़े होंगे, यदि यही उनका मातृभाषा से कोई सरोकार नहीं होगा, यदि उन्हें यही अपनी भाषा से प्यार या सरोकार होगा तो वे विदेशों में जाकर किस हद तक हिंदी को अपनाएँगे यह भली-भांति समझा जा सकता है। विश्व के विभिन्न देशों में जितने भी हिंदी – प्रेमी हैं, हिंदी के लेखक और साहित्यकार हैं, जिन्हें हम प्रवासी हिंदी साहित्यकार कहते हैं या प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से हिंदी के समर्थक और हिंदी सेवी हैं, यह प्रायः भारत भूमि से ही जुड़े रहे हैं और इन्होंने बचपन से ही हिंदी को जीया है। कहने का आशय यह है कि जब भारत भूमि पर हिंदी की फसल उगेगी तो वह विदेशों में भी पहुंचेगी और वहाँ भी उगेगी और बढ़ेगी। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए भारत भूमि पर हिंदी शिक्षा और हिंदी भाषा माध्यम से शिक्षा की आवश्यकता है। अगर हम हिंदी – शिक्षा की सुविधाओं की बात करें तो स्थिति उलट है। हिंदी के ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं के भी विद्यालय बड़ी संख्या में बंद होते जा रहे हैं और उससे कई गुना तेजी से अंग्रेजी माध्यम के स्कूल बढ़ रहे हैं। यानी आवश्यकता न होने से उपवब्ध सुविधाएँ भी समाप्त होती जा रही हैं।  विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर स्तर पर कक्षाओं के लिए कॉलेजों में विद्यार्थी ना मिलने के कारण विभाग बंद होने के कगार पर हैं। देश में हजारों – लाखों भवन जिनमें कल तक हिंदी माध्यम के विद्यालय था अब उसमें अंग्रेजी माध्यम का विद्यालय चलने लगे है। कारण स्पष्ट है कि अब वहाँ हिंदी माध्यम न आवश्यक है न आवश्यकता। ऐसी में यदि आप भारतीय भाषा माध्यम ज्ञान-विज्ञान की अच्छी से अच्छी पुस्तकें भी उपलब्ध करवा देंगे। हिंदी शिक्षा के लिए आधुनिकतम तकनीक और भाषा वैज्ञानिक ढंग से पढ़ाने की प्रविधि भी उपलब्ध करवा दें तो भी इससे कितना लाभ होगा, यह समझा जा सकता है। इसके विपरीत यदि पर्याप्त  सुविधाएँ न भी हों तो भी माँग और पूर्ति के सिद्धांत के चलते रास्ते खुलने लगेंगे। कहा जाता है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। लेकिन भारत में तो हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा को ले कर पिछले लंबे समय से विपरीत धारा बह रही है। स्वतंत्रता के समय भारत में 99% से भी अधिक विद्यार्थी मातृभाषा में ही पढ़ते थे। स्वतंत्रता के पश्चात हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर पढ़ाया जाने लगा था। हिंदी भाषी क्षेत्रों में शिक्षा का माध्यम हिंदी भाषा ही थी और अन्य राज्यों में भी कुछ अपवाद छोड़ दें तो दसवीं तक हिंदी पढ़ाई जाती रही है। लेकिन आगे चलकर विशेषकर 1986 की शिक्षा नीति के पश्चात, यह धारा विपरीत दिशा में बहने लगी और धीरे-धीरे मातृभाषा माध्यम के बजाय अंग्रेजी माध्यम के आने से हिंदी भाषी क्षेत्र के विद्यार्थियों का अपनी बात मातृभाषा यानी हिंदी माध्यम से नाता टूटने लगा। महानगरों से चलने वाली यह धारा धीरे-धीरे गाँवों तक पहुँच गई। हम कितनी भी अपनी भाषा की बात करें, राजभाषा की बात करें, हिंदी की बात करें राष्ट्रीय संपर्क भाषा की बात करें, राष्ट्रीय एकता या राष्ट्र-प्रेम की दुहाई दें, लेकिन भाषा तो वही अपनानी पड़ती है जो पेट की भाषा होती है, रोजगार की भाषा होती है। अगर संसाधनों की ढलान अंग्रेजी की तरफ रहेगी तो शिक्षा की ढलान हिंदी की तरफ या भारतीय भाषाओं की तरफ कैसे होगी? इसलिए यह आवश्यक है कि रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी भाषा के प्रयोग को प्रतिष्ठित किया जाए। जब रोजगार के क्षेत्रों में हिंदी की आवश्यकता बढ़ेगी तो उसका सीधा प्रभाव हिंदी-शिक्षा पर पड़ेगा और जब शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी का प्रचार होगा तो वह न केवल देश में बल्कि विदेशों तक पहुंचेगा।

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