ईरान पर अमेरिका और इजरायल की ओर से चल रही लड़ाई के 38 दिन बीत चुके हैं। इतने दिनों में पूरी दुनिया की जियोपॉलिटिक्स में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव हुआ है। लेकिन, भारत की जो कूटनीति रही है, उसकी तारीफ ईरान भी दिल खोलकर कर रहा है। भारत में ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने स्पष्ट तौर पर यह बात कही है। भारत की कूटनीति बहुत अच्छी है और (युद्ध के) इस मुद्दे पर भी वे और ज्यादा महत्वपूर्ण रोल निभा सकते हैं। शुरू से इसमें बहुत बड़ी गलती हुई। यह सिर्फ ईरान के खिलाफ युद्ध नहीं था, यह युद्ध हर इंसान के खिलाफ था; यह पूरी दुनिया के खिलाफ था। आप देखेंगे कि इस युद्ध की वजह से विभिन्न देशों में इस समय बहुत सारे लोगों को तकलीफ झेलनी पड़ रही है। ईरान भारत समेत पांच मित्र राष्ट्रों (रूस, इराक, चीन और पाकिस्तान) के लिए होर्मुज जलडमरुमध्य खोलने की घोषणा कई दिन पहले कर चुका है। पश्चिम एशिया युद्ध के दौरान ईरान ने भारत की कूटनीति की काफी तारीफ की है। भारत के लिहाज से अच्छी बात यह भी है कि अब तक होर्मुज खोलने को लेकर जो सबसे अहम रुकावट थी, उस पर भी काम शुरू हो गया है। तीसरी बात ये है कि ईरान और भारत के बीच द्विपक्षीय संबंधों के लिए चाबहार पोर्ट बहुत ही अहम कड़ी है और उसको लेकर युद्ध में भारी चुनौतियों के बावजदू ईरान ने बहुत ही सकारात्मक संदेश दिए हैं। बातचीत के दौरान दोनों देशों के एक्सपर्ट ने मौजूदा हालातों में सभी तरह के विकल्पों पर विचार किया है। युद्ध से पहले होर्मुज स्ट्रेट होकर भारत का 40% कच्चा तेल और 90% एलपीजी आयात होता था। पिछले कुछ वर्षों में भारत और ईरान के संबंध चाबहार पोर्ट की वजह से नई बुलंदियों को छूने लगे थे। ईरान ने युद्ध के दौरान और युद्ध के बाद के लिए भी इस मामले में बहुत ही सकारात्मक संकेत दिए हैं। मोहम्मद फथाली ने दोनों देशों के भविष्य के रिश्तों को लेकर असीम संभावनाएं जताई हैं और कहा है, ‘हमारे दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग आपसी हित और भरोसे पर आधारित है और इसके भविष्य में और बढ़ने की काफी संभावनाएं हैं।‘ उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों में चाबहार पोर्ट को बहुत ही अहम बताया है। चाबहार पोर्ट में भारत की हिस्सेदारी पाकिस्तान को फूटे आंखों नहीं सुहाती है और अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से भी यह भारत के लिए परेशानी का सबब बनता रहा है। चाबहार पोर्ट के संबंध में, एक रणनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में यह ईरान, भारत और इस क्षेत्र के बीच ट्रेड और ट्रांजिट लिंक को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ईरान की सहमति से होर्मुज जलडमरुमध्य से अब तक भारतीय झंडे वाले 16 जहाज गुजर चुके हैं। ग्रीन आशा एलपीजी लेकर होर्मुज से गुजरने वाले आठवां भारतीय टैंकर है। जग विक्रम भी एलपीजी गैस लेकर भारत आ रहा है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड नेवी ने कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य “कभी भी अपनी पुरानी स्थिति में वापस नहीं आएगा, खासकर अमेरिका और इजरायल के लिए।” ईरान की संसद ने मसौदा कानून को मंजूरी दे दी है। जिसमें इस रणनीतिक जलमार्ग से होने वाली शिपिंग पर नए नियंत्रणों का प्रस्ताव है। बहुत आसान शब्दों में समझें तो ईरान ने साफ कर दिया है कि टकराव का अंत फिलहाल नहीं होने वाला है। ईरानी मीडिया के मुताबिक इस योजना में जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के लिए ट्रांजिट फीस शामिल किया गया है जिसका भुगतान ईरान की राष्ट्रीय मुद्रा में किया जाएगा। अमेरिकी और इजरायली जहाजों के गुजरने पर प्रतिबंध भी लगाया जाएगा। इसमें उन देशों पर भी पाबंदियां लगाने का प्रस्ताव है जो ईरान के खिलाफ एकतरफा प्रतिबंधों का समर्थन करते हैं। इस मसौदा कानून में जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता, उसके सशस्त्र बलों की भूमिका, समुद्री सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और ओमान के साथ कानूनी समन्वय से संबंधित प्रावधानों की भी रूपरेखा दी गई है। इससे पहले रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को दी गई अपनी चेतावनी को और सख्त कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर ईरान की सरकार सोमवार तक ‘होर्मुज जलडमरूमध्य‘ को दोबारा नहीं खोलती है तो वह ईरान के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर जोरदार हमला करेंगे। रविवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में ट्रंप ने अपनी धमकी के साथ-साथ अपशब्दों का भी इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि मंगलवार का दिन ईरान के लिए “पावर प्लांट डे और ब्रिज डे, दोनों एक ही दिन में” होगा।