भाजपा द्वारा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बावजूद भी आम चर्चा है कि क्या देश में अपेक्षित परिवर्तन आ पायेगा या पूर्ववत् ही शासकीय व्यवस्था का यह कार्यकाल भी गुजरने वाला है। परितर्वन की अपेक्षा में सर्वदा ही बेहतरी की उम्मीद होती है। यदि यह आशंका हो कि आने वाला परिवर्तन वर्तमान से भी बुरा होने वाला है तो कोई भी व्यक्ति इस तरह के किसी परिवर्तन की आशा नहीं करना चाहेगा! यह मानव प्रकृति रही है कि वह पल-पल बेहतरी की उम्मीद ही पालता है। भारतीय जनता पार्टी की बहुमत की सरकार आने के उपरांत लोगों में उम्मीदों का उठना स्वाभाविक है। यह प्रकृति है इसे कभी भी झुठलाया नहीं जा सकता! यद्यपि कि वर्ष -२०१४ में भी भाजपा एवं उसके सहयोगियों ने पर्याप्त बहुमत से सरकार बनाई थी। किंतु लोगों ने पूर्व की सरकारों से अलग कोई भी नवीन उपलब्धि नहीं देखी थी। जो हुआ उतना तो कोई भी सरकार आती करती ही। किंतु भाजपा से लोगों को शासन में आमूल-चूल परिवर्तन की उम्मीद थी, जो बस मीडिया की खबरों में ही पूर्ण बताई जाती रही। परिवर्तन हुआ था, किंतु आंशिक रुप से। पूर्ण तो जाने दें, अपेक्षित परिवर्तन के भी लाले पड़ गये थे।
प्र. मं. मोदी के नेतृत्व में देश में विदेश नीति में सुधार, विदेशी तकनीक एवं उपनिवेश का आना तथा बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं की उम्मीद शायद कम ही लोगों में थी। देश की ८० प्रतिशत जनता वर्तमान में भी कृषि पर निर्भर रही है, जिसके लिये बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में भाजपा सरकार काफी कुछ असफल मानी जाती है। महाराष्ट्र के ही किसानों को देखें तो वे अब भी कर्ज में डूबे हैं। अधिकांश कृषकों के कर्ज माफ करने का दावा भले ही राज्य सरकार करती रही है किंतु किसानों की स्थिति अब भी तंग हाल बताई जाती है। अनेक बुद्धि जीवियों का मत रहा है कि कर्ज माफ कर देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। स्थायी रुप से किसानों की समस्याओंका समाधान तो तब होगा, जब ऐसी व्यवस्था (योजनायें) अमल में लाई जायं कि किसानों को कर्ज लेने की जरुरत ही न पड़े। किंतु ऐसा तो कुछ किया ही नहीं गया हैं। सबसे विचित्र तो यह है कि विगत वर्षो से ही भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना सरकार व भाजपा की आलोचना करती रही है, जिससे यह कहा जा सकता है कि सरकार अपेक्षाओंपर खरी नहीं उतरी है।
केन्द्र सरकार की यदि बात की जाय तो यह कहा जा सकता है कि सरकार की अस्त-व्यस्त एवं अनावश्यक कार्यो के उपरांत भी। भाजपा का उससे भी अधिक बहुमत वर्ष-२०१९ में प्राप्त करना, भाजपा की लोकप्रियता कम, राजनैतिक विकल्प हीनता अधिक रही है। भाजपा सरकार ने राष्ट्र सुरक्षा एवं विदेशी कूटनीति में भले ही सफल रही है किंतु देश के अंदरुनी मामलों में कुछ खास परिवर्तन लाने में तो असफल ही मानी जा रही है। देश-समाज एवं राष्ट्रहित के चिंतकों का यह मत रहा है कि भाजपा सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली में कोई परिवर्तन नहीं ला पायी है। इसका कारण सरकारी मशीनरी की वही ७० वर्षों से चली आ रही व्यवस्था, कार्यशैली एवं सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर न कांग्रेस सरकार ही कोई प्रतिबंध लगा पायी है और ना ही भाजपा ने सरकारी मशीनरी पूर्ववत् भ्रष्ट, जीर्ण-शीर्ण एवं ईमानदारी से काफी दूर रही है। फिर इस बात का कोई भी महत्व नहीं है कि केन्द्र व राज्य सरकार में कोई भी दल सत्ता पर काबिज रहे! संस्कृति वही है किंतु नुमाइन्दे बदलते रहे हैं। यह तो भविष्य ही बतायेगा कि दूसरे कार्यकाल में भाजपा क्या-क्या कर पाती है।


