यों तो साहित्यकारों एवं पत्रकारों में ढांचागत भेद कर पाना आसान नहीं हैं, यदि दोनों ही वर्ग की विभूतियां सत्यप्रेमी एवं अपनी-अपनी विधाओंके प्रति ईमानदार हैं, तो दोनों ही समाज एवं राजनीति की आंखों में खटकते रहते हैं तथा लोग उन्हें अन्य लोक या देश का प्राणी समझ उनसे हर हाल में परहेज करना चाहते हैं, उन्हें कभी-कभी यह प्रतीत होने लगता है कि वे अपनी रचनाओं, समाचारों, आलेखों एवं कविताओंसे उनका नुकसान करते हैं। किंतु वास्तविकता तो यह है कि कवि, लेखक पत्रकार साहित्यकार का ऐसा कुछ भी पूर्वाग्रह नहीं होता है। वह तो समाज की कुरितियों, परम्पराओं, ढोंग विधियों एवं अंधेरे में छिपी हुई मानव द्रोही प्रवृत्तियों को रोशनी में लाते हैं। लोगों के अंधेरों में उलझे ह्रदय को ज्योर्तिमय बनाते हैं। प्रख्यात कवि किशन सरोज की निम्नांकित पंक्तियां पत्रकारों, साहित्यकारों की मनोदशाओं एवं परिस्थितियों को अत्योत्तम रुप में व्याख्यायित करती हैं।
’मन की व्यथा अनमनी बेंची,
तन की ज्योति कंचनी बेंची।
कुछ न मिला तो अंधियारों को-
माटी-मोल चांदनी बेंची!“
चांदनी यानि कि उजाला, रोशनी या रहस्योद्घाटन, जिसे ‘कलमकार’ अपना धर्म-कर्म समझते रहे हैं। यहां हास्यास्पद ही होगा कि ‘कलमकार’ ज्योति (रोशनी) का ऐसा व्यापार जीवन भर करता रहता है, जो उसे आर्थिक लाभ तो नहीं पहुंचाती, अपितु आर्थिक विपन्नता की ही ओर ले जाती है। क्योंकि रोशनी (ज्ञान) खरीदने-बेंचने की वस्तु नहीं है। वह तो मात्र ऐसे ही मानवता के कल्याणार्थ अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता रहता है। बिना किसी लाग-लपेट के अर्थलाभ की चिंता किये बिना किसी भी दुराचारी एवं समाज शोषक के कुकर्मो को बेनकाब कर उसे ही नहीं, समाज को भी आइना दिखाता रहता है। उसे तो समाज में सर्वसामान्य वर्ग उत्पीड़न करने वाले शोषकों की खिलाफत करनी होती है। अपनी भावनाओं को बे खटके उग्र रुप में प्रस्तुत कर विषमता के खुरदरे मुंह पर तमाचा लगाने का कार्य हमारे कई साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने किया है। इनमें सर्वाधिक एवं सर्वोच्च महत्व महाप्राण सूर्यकांत जी त्रिपाठी ‘निराला’ जी को देना अनिवार्य है। पूंजीवाद पर कठोरतम् प्रहार करते हुए उन्होंने कहा है-
’अबे बे, सुन गुलाब,
कहां पाई ये खुशबू रंगों -आब?
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा कैपिटलीस्ट?“
खाद (कम्पोस्ट) ही उनका सर्वहारा वर्ग रहा है। यदि खाद-पानी न हो तो कोई भी फूल या पौधा विकास नहीं करेगा किंतु जमाने का यह सत्य है कि कोई भी विकसित होने वाला पौधा-पेड़ अपनी मिट्टी व खाद-पानी के संबंध में नहीं सोचता! यदि सोचता तो बड़े-बड़े घोटालों -महाघोटालों को उजागर करने वाले पत्रकारों पर जान लेवा हमले न होते। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि सर्वसामान्य वर्ग से आनेवाले अनेक प्रशासनिक अधिकारी भी अपने कर्तव्यों से विमुख हो, राजनेताओं व पूंजीपतियों के इशारों पर, अपने ही सामान्य वर्ग से आये हुए कलमकारों को बलि का बकरा बनाते देखे जाते हैं, जो कि हजार खतरों को उठाकर भी सत्य के लिए प्रतिबद्ध होता है।


