देश में कोयले की कमी से कई राज्यों में बिजली उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित हुई है । हालात सामान्य हो रहे हैं लेकिन सवाल यह उठता है जो कोयला बचा है वह कब तक चलेगा ? आकलन बताता है कि भारत के पास केवल 106 वर्षों के लिये ही कोयला शेष है । उसके बाद का जीवन क्या थम जायेगा ? कैसे चलेगा ? अमेरिकी एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट के अनुसार , ” भारत में चीन के बाद दुनिया की सर्वाधिक खपत होती है जोकि एक अरब टन है तो इसकी पूर्ति कैसे होगी यह विचारणीय प्रश्न है ?
” भारत में सूर्य 300 दिन अपना प्रकाश बिखेरता है । एक मेगावाट सौर बिजली उत्पादन के लिये तीन हेक्टेयर समतल भूमि चाहिये । भारत के पास इसकी अपार सम्भावनाएं हैं । प्रधानमन्त्री जी ने इसे श्योर , प्योर और सिक्योर कहा है । सूरज से उत्पन्न ऊर्जा पूरी तरह स्वच्छ होने के साथ ही सुरक्षित भी है । इस त्रिस्तरीय फॉर्मूले पर काफी काम हुआ है । 2016 में प्रति यूनिट पवन ऊर्जा की लागत 4.18 रुपये थी , जो 2019 में 2.48 रुपये हो गई । वहीं प्रति यूनिट सौर ऊर्जा की लागत 4.43 रुपये से 2.24 रुपये पर आ गई । 2013 में ऊर्जा उत्पादन 34,000 मेगावाट था जो आज 89,636 मेगावाट हो गया है । भारत सौर ऊर्जा उत्पादक क्षेत्रों में तीसरे स्थान पर हैं । 2018 में सौर ऊर्जा के उत्पादन में 9,400 मेगावाट की वृद्धि हुई थी , बल्कि 2020 में 5700 मेगावाट रह गई ।
मोदी जी भारत को ऊर्जा के जिस स्तर पर ले जाना चाहते हैं उसका लक्ष्य कठिन है । एक मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन पर अभी 6.5 करोड़ रुपये की लागत आ रही है इसलिये 2030 तक लक्ष्य के अनुरूप 26 हजार मेगावाट उत्पादन का अर्थ है 1.19 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक निवेश । इसमें एक अड़चन यह भी है कि इसके आवश्यक उपकरण भारत में नहीं बन रहे हैं । 2020 में 2.5 अरब डॉलर मूल्य के उपकरण हमने भारत में आयात किये हैं । चीन पर उपकरणों की निर्भरता एक कड़वा सत्य है । बिजली उत्पादन का एक पहलू तो उपरोक्त रहा , दूसरा पहलू यह भी है कि रूफ टॉप तकनीक ( बिजली उत्पादन ) को भी अपनी समानान्तर प्राथमिकता में रखें । एक घर की छत पर दो किलोवाट का सोलर पैनल प्रतिदिन 10 यूनिट बिजली बनाता है । इस मामले में सब्सिडी की 40 हजार रुपये की सीमा को बढ़ाया जाना चाहिये । जिससे वैकल्पिक बिजली का सपना पूरा हो सकता है ।
मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की रिपोर्ट 2050 तक दुनिया में ऊर्जा की माँग तीन गुना बढ़ जायेगी और फिर उसकी पूर्ति असम्भव हो जायेगी । हमारी बिजली का 70 प्रतिशत हिस्सा कोयला आधारित तापीय संयंत्रों से आता है । इसमें 29 फीसद की भागीदारी नवीकरणीय ऊर्जा , दो फीसद परमाणु ऊर्जा , 1 फीसद गैस आधारित ऊर्जा है । कोयले से बनने वाली बिजली सौर ऊर्जा से 14 फीसद सस्ती होती है । उच्च गुणवत्ता का कोयला हमें आयात करना होता है । इसके लिये आवश्यक है सौर ऊर्जा के साथ परमाणु बिजली के लिये भी उपाय हों , इसके लिये यूरेनियम के विकल्प के तौर पर थोरियम को इस्तेमाल हो , जिसके प्रचुर भण्डार केरल और तमिलनाडु में है ।
माननीय मोदी जी ने नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को लेकर वैश्विक स्तर पर घोषणा की है । उन्होंने ऊर्जा के ये पंचामृत बताये हैं जो क्लाइमेट एक्शन में भारत को महत्वपूर्ण योगदान देंगे 2030 तक 500 गीगावाट बिजली उत्पादन , 50 प्रतिशत नवीकरण ऊर्जा , कुल प्रोजेक्ट में कार्बन एमिशन में एक बिलियन टन की कमी , अर्थव्यवस्था की कार्बन इंटेन्सिट को 45 प्रतिशत से कम और पाँचवाँ वर्ष 2070 तक भारत नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा । इस तरह से हम भविष्य और वर्तमान दोनों को सुरक्षित कर सकते हैं बस जरूरत है दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ काम करने की । – नन्दिनी रस्तोगी ‘नेहा’ मेरठ


