कोवेक्सिन को मंजूरी देते समय कहा गया है कि यह अनुमति केवल परीक्षण के आधार पर दी जा रही है। जानकारों का कहना है करोड़ों लोगों पर ट्रायल का अधिकार सरकार को किस कानून के तहत मिलता है? पिछले वर्ष मार्च में केंद्र सरकार ने जिस तरह जल्दबाजी में लॉकडाउन कर करोड़ों मजदूरों को परेशान किया, उसी उतावलेपन में उसने कोरोना वैक्सीन को मंजूरी देकर विवाद पैदा कर दिया है। देश के कई शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञों को लगता है कि सरकार को कोवेक्सिन और कोविशिल्ड नामक टीके को मंजूरी देने से पहले उनके सुरक्षा विवरण का खुलासा करने की आवश्यकता है। भारत बायोटेक द्वारा विकसित कोवेक्सिन के परीक्षण का तीसरा चरण जारी है। अभी तक इसके परिणाम नहीं आए हैं, फिर भी इनके आपात उपयोग की अनुमति दी गई है, जिससे टीका लेने वाले लाखों लोगों के जीवन को खतरे में डालने का खतरा पैदा हो गया है। कोवेक्सिन को मंजूरी देते हुए यह कहा गया है कि अनुमति केवल परीक्षण के आधार पर दी गई है। विशेषज्ञ सवाल पूछ रहे हैं कि कौन सा कानून सरकार को लाखों लोगों की की जान को जोखिम में डालने का अधिकार देता है? इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के सहयोग से हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक द्वारा विकसित किए जा रहे कोवेक्सिन के पहले और दूसरे चरण का परीक्षण पूरा हो चुका है, लेकिन तीसरा चरण अभी भी जारी है। पहले और दूसरे चरण में टीका सुरक्षा पर जानकारी एकत्र की जाती है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता पर जानकारी केवल तीसरे चरण में एकत्र की जाती है। तीसरे चरण का परीक्षण नवंबर महीने में शुरू हुआ है। उसमें कुल 25800 स्वयंसेवकों की भर्ती की जानी थी, लेकिन अब तक केवल 22500 लोगों की ही भर्ती हो पाई हैं। इनमें से केवल 10,000 स्वयंसेवकों को ही टीका की दोनों खुराक दी गई हैं। पहली खुराक के बाद वैक्सीन को इसकी प्रभावशीलता का परीक्षण करने के लिए तीन दिनों तक इंतजार करना पड़ता है। कोवेक्सिन को तीसरे चरण के परीक्षण के परिणामों की प्रतीक्षा किए बिना सरकार द्वारा मंजूरी दी गई है। यह मंजूरी सीमित है, लेकिन इसकी शर्तों का खुलासा नहीं किया गया है। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ बायोएथिक्स के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनंत भान कहते हैं, वैक्सीन की प्रभावशीलता के बारे में डेटा प्रकाशित किए बिना जिन दो देशों ने अनुमति दी है उसमें चीन और रूस का समावेश है। नियमन की प्रक्रिया में लोगों को विश्वास रखने की आवश्यकता है। यहां जिस तरह से मंजूरी दी गई है, उस पर भरोसा हो जरूरी नहीं। ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की मुखिया मालिनी ओसोला कहती हैं, जिस वैक्सीन को आपात इस्तेमाल की मंजूरी दी गई है, वह देश के किस कानून के तहत है? इसके अलावा, यह मंजूरी किन शर्तों के तहत दी गई है? यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है। यह अनुमति किस कानून या शर्त के आधार पर दी गई है इसका खुलासा करने की हम मांग करते हैं। हम यह भी नहीं मानते कि कोवेक्सिन ब्रिटिश वायरस के खिलाफ काम करेगा। इस संबंध में कोई अध्ययन नहीं किया गया है और कोई सूचना जारी नहीं की गई है। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स के संपादक डॉ. अमर जसानी पूछते हैं, “यह चौंकाने वाला है कि भारत बायोटेक को अभी भी परीक्षण के तीसरे चरण के लिए स्वयंसेवकों को तैयार करने में कठिनाई हो रही है, ऐसे में टीके के आपात इस्तेमाल की मंजूरी दी गई, यह बात चौंकानेवाली है। जिन दो वैक्सीन को स्थानीय प्रभावशीलता के आधार पर मंजूरी दी गई, वह डेटा कहां है? सब्जेक्ट अप्रूवल कमेटी द्वारा किस डेटा के आधार पर मंजूरी दी गई है? यही हम जानना चाहते हैं। ” चंडीगढ़ के पीजीआईएमएस अस्पताल में भारत बायोटेक के कोवेक्सिन का परीक्षण चल रहा है। उन्हें परीक्षण के तीसरे चरण के लिए कुल 1,000 स्वयंसेवकों की भर्ती करनी थी, लेकिन वे केवल 450 स्वयंसेवकों की भर्ती कर पाए हैं। उनमें भी केवल 350 स्वयंसेवकों को ही दोनों खुराक दी गई है। परीक्षण को पूरा करने के लिए उन्हें 550 लोगों की भर्ती करनी होगी और उन्हें दोनों खुराक देनी होगी। दो खुराक के बीच 28 दिनों का अंतराल आवश्यक है। दूसरी खुराक लेने के बाद परिणाम आने में लगभग 45 दिन लगते हैं। इस अस्पताल की डॉ. सविता वर्मा कहती हैं, “हमने पहले और दूसरे चरण के परीक्षणों से डेटा एकत्र किया है, लेकिन प्रभावशीलता के मामले में यह मायने नहीं रखता है।” इसके लिए बड़े पैमाने पर तीसरे चरण के परीक्षण की आवश्यकता है। हैदराबाद के निज़ाम संस्थान के डॉ. प्रभाकर रेड्डी का कहना है कि पहले दो चरणों में केवल 90 प्रतिशत लोगों में इम्युनिटी जनरेट हुई थी। वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और संक्रामक रोग के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ डॉ. गगनदीप कांग कहते हैं, ”सब्जेक्ट अप्रूवल कमेटी ने जिस तरह से कोवेक्सिन और कोविशील्ड को मंजूरी दी है, मैं उससे भ्रमित हूं। दोनों टीकों को अलग-अलग शर्तों के साथ कमेटी द्वारा मंजूरी दी गई है, लेकिन भाषा का इस्तेमाल दोनों के लिए एक जैसा किया गया है। दोनों के बीच क्या अंतर है? मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ। उन्होंने कोवेक्सिन को क्लिनिकल परीक्षण के रूप में मंजूरी दी है, इसका क्या मतलब है, मुझे नहीं पता। कोवेक्सिन का क्लीनिकल परीक्षण चल रहा था; तो उसकी मंजूरी की क्या जरूरत थी? कोविशील्ड को किस आधार पर मंजूरी दी गई, इसका भी खुलासा नहीं किया गया है। ब्रिटेन और अमेरिका में जिन वैक्सीन को स्वीकृति दी गई उनका डेटा जारी किया गया है। ” पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट द्वारा जो कोविशील्ड नामक वैक्सीन विकसित की गई, उसे ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सहयोग से बनाया किया गया है। सीरम इंस्टीट्यूट द्वारा भारत में दूसरे और तीसरे चरण के परीक्षणों में न केवल टीके की प्रभावशीलता पर, बल्कि इसकी सुरक्षा का भी परीक्षण किया गया। वास्तव में परीक्षण के तीसरे चरण में वैक्सीन की प्रभावशीलता का परीक्षण करना शामिल है। सीरम इंस्टीट्यूट ने प्रभावशीलता के लिए ब्रिटेन में हुए परीक्षण का डेटा प्रस्तुत किया था। आंकड़ों के मुताबिक ब्रिटेन में इसकी प्रभावशीलता 90 फीसदी तक थी। यदि भारत में इस तरह का परीक्षण किया गया होता, तो वैक्सीन की प्रभावशीलता केवल 62 प्रतिशत पाई गई होती। इसका मतलब है कि यदि कोविशिल्ड को 100 करोड़ लोगों को दिया जाता है, तो उनमें से 38 करोड़ लोगों को कोविड -19 से संक्रमित होने की संभावना है। यदि टीका लगने के बाद भी संक्रमण का 38 प्रतिशत खतरा है, तो टीका लगवाने के लिए कौन तैयार होगा? भारत सरकार द्वारा भारत बायोटेक के कोविक्सिन को मंजूरी देते समय कहा गया था कि इसे भविष्य में देखे जाने वाले कोरोना वायरस के खिलाफ एक बैकअप योजना के रूप में मंजूर किया गया है। विशेषज्ञों द्वारा इसे भी संदेह के रूप में देखा जा रहा है। कौन सा टीका वर्तमान वायरस से लड़ने में सक्षम है या नहीं? इसका कोई सबूत नहीं है कि सरकार भविष्य के वायरस के बारे में बात कर रही है। इससे वैक्सीन को लेकर विशेषज्ञों में संदेह पैदा हो गया है। इसका प्रभाव आम नागरिक पर भी पड़ेगा। क्या कोई नागरिक टीका परीक्षण के लिए अपना शरीर दान करने को तैयार होगा?


