आओ बदलें हम जग को नये साल में,
फिर खिलेंगे नये फूल, नये साल में।
आंसुओं का मौसम फिर दिखे न यहाँ,
हवा जहरीली हो न फिर नये साल में।
तप रहा है मंहगाई का सूरज देखो,
कोई भूखा न सोये इस नये साल में।
जिन्दगी का सफर अब बनें खुशनुमा,
रातरानी फिर गमके नये साल में।
अन्नदाता की राहें कंटीली न हों,
फिर न सड़कों पे उतरे नये साल में।
रोजी – रोटी छीनी थी जिनकी यहाँ,
फिर बुलंदी पे पहुंचे नये साल में।
पीकर बेहोश हैं उसकी आँखों से वो,
कोई मदहोश हो ना , नये साल में।
फिर से सरहद पे अमन हो कायम,
बम बरसाये न कोई नये साल में।
रामकेश एम.यादव


