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Homeअन्यकविता-ग़ज़लकोई लीले न सूरज !

कोई लीले न सूरज !

आओ बदलें हम जग को नये साल में,

फिर  खिलेंगे  नये  फूल, नये साल में।

आंसुओं का मौसम फिर दिखे न यहाँ,

हवा जहरीली हो न फिर नये साल में।

तप रहा  है  मंहगाई  का सूरज  देखो,

कोई भूखा  न सोये  इस नये साल में।

जिन्दगी का सफर अब बनें खुशनुमा,

रातरानी  फिर  गमके   नये  साल  में।

अन्नदाता   की  राहें   कंटीली  न  हों,

 फिर न सड़कों  पे उतरे  नये साल में।

रोजी – रोटी  छीनी  थी  जिनकी  यहाँ,

फिर  बुलंदी पे  पहुंचे   नये  साल  में।

पीकर बेहोश  हैं उसकी आँखों  से वो,

कोई   मदहोश हो  ना , नये  साल  में।

फिर से  सरहद  पे  अमन   हो कायम,

 बम  बरसाये  न  कोई  नये   साल  में।

         रामकेश एम.यादव

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