गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के इंडिया गेट पर सैन्य शक्ति प्रदर्शन की परंपरा बहुत पुरानी है। इस बार भी 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड निकाली जाएगी। सशस्त्र बल उसकी अगुवाई करेंगे। सैनिक मिलिट्री बैंड की धुनों पर मार्च पास्ट करेंगे। जंगी जहाजों की आवाज से आसमान थर्रा उठेगा। लेकिन यह सब क्यों? 26 जनवरी को तो भारत का संविधान लागू हुआ था। फिर हम संविधान के लागू होने का जश्न क्यों नहीं मनाते? संविधान दिवस पर सैन्य ताकत दिखाने का क्या मतलब है? इस रोज यानी 26 जनवरी को संविधान अपनाकर भारत अपने कायदे-कानून बनाने वाला गणतंत्र बना। ऐसा गणतंत्र, जिसने इंसाफ, आजादी, बराबरी और भाईचारे की कसम खाई है। इन आदर्श लक्ष्यों का सशस्त्र बलों से कोई लेना देना नहीं है। लिहाजा गणतंत्र दिवस समारोह का तौर तरीका बदला जाना चाहिए ताकि हम उन आदर्शों को याद कर सकें, जिनका हलफ उठाया गया था। एक समय था, जब भारत इस बात पर गर्व करता था कि गांधीवादी अहिंसा पूरी दुनिया के लिए एक नैतिक सबक है। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग ने महात्मा गांधी के तरीके अपनाए। वह अमेरिका में सबसे बड़े अश्वेत नेता बन गए और अमेरिका के नायकों में उनका शुमार होता है। नेल्सन मंडेला ने भी दक्षिण अफ्रीका में गांधीवादी रास्ता अपनाया और रंगभेदी शासन को पलट दिया। गांधीवाद पर गर्व करने लायक ये लम्हे युद्ध और हिंसा के चलते सामने नहीं आए। शांतिपूर्ण असहयोग ने यह सब संभव किया। भारतीय जनता पार्टी चाहती है कि भारत विश्व गुरु बने, लेकिन भारत ने दुनिया को जो सबसे बड़ी चीज दी है, उसे वह नजरंदाज करती है। यह चीज है गांधीवादी अहिंसा का रास्ता। यानी शांति का रास्ता। बहरहाल, वे दिन हवा हुए, जब भारत गांधीवादी अहिंसा की बातें करता था, इस पर गर्व करता था। हिंदू राष्ट्रवाद सैन्य ताकत का झंडा लेकर चलता है और अब यही प्रभावी मूल्य बन गया है, अब इसी विचार का बोलबाला है। भारतीय फिल्मों में सेना के जरिए फतह से लेकर हर तरह की हिंसा का महिमामंडन किया जाता है, लेकिन उनमें शायद ही कभी अहिंसा का गुणगान किया जाता हो। इस मामले में फिल्म मुन्ना भाई-2 को एक बड़े अपवाद के रूप में देखा जा सकता है। भारत में कोई युद्ध विरोधी आंदोलन नहीं हुआ है। आज लोग युद्ध को नुकसानदेह नहीं मानते, वह यह नहीं मानते कि जंग तबाही लाता है, बल्कि वह युद्ध को गर्व की चीज मानते हैं। यह बहुत गलत सोच है। इतिहास में अधिकतर युद्धों का महिमामंडन किया गया। उनमें लोगों के मारे जाने और लूटपाट को नजरंदाज कर दिया गया, यह कहकर कि युद्ध में ऐसा नुकसान तो होता ही है। जिन्होंने बड़े नरसंहार किए, जिन्होंने बड़ी जीत हासिल कीं, उनके नाम के साथ महान होने का तमगा जोड़ दिया गया, जैसे एलेग्जेंडर द ग्रेट और पीटर द ग्रेट आदि इत्यादि। दुनिया भर में ऐसे नजरिए को पहली चुनौती मिली यूरोप में हुए पुनर्जागरण से। जिसके चलते मानव अधिकारों का मुद्दा बहस के केंद्र में आया। फिर पहले विश्व युद्ध ने दिखाया कि मॉडर्न टेक्नॉलजी ने मृत्यु और विनाश की कितनी बड़ी क्षमता पैदा कर दी है। ऐसी तबाही की ताकत, कि युद्ध जीतने वाले भी अंत में लगभग उतने ही बदहाल हो गए, जितने हारने वाले हुए। उस दौरान यूरोप में युद्ध के मोर्चों पर लाखों सैनिक मारे गए। नौजवानों की एक पूरी पीढ़ी ही खत्म हो गई। मस्टर्ड गैस जैसी चीजों के इस्तेमाल ने लोगों की जान ली, लेकिन ऐसे रासायनिक हथियारों से कोई सैन्य बढ़त हासिल नहीं हुई। कुल मिलाकर पहली आलमी जंग का मंजर बहुत खौफनाक था। कहा गया कि अब इसके बाद दुनिया फिर कोई जंग लड़ने का मंसूबा नहीं बांधेगी। अफसोस, ऐसा हो नहीं सका। पश्चिमी देशों ने जर्मनी पर पहले विश्व युद्ध के खर्च की भरपाई करने का दबाव बनाया। इससे वहां हिटलर का उदय हुआ। इस तरह पहले विश्व युद्ध ने दूसरे विश्व युद्ध की राह बना दी। अबकी बार तो 7 करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए। एटम बम ने दिखा दिया कि इंसान अपने हाथों से खुद को मिटा सकता है। ऐसा तो नहीं हुआ कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद जंग नहीं हुईं, लेकिन बाद के युद्धों में देश भक्ति का वह उबाल नहीं दिखा, जो पहले दिखता था। दुनियाभर से युद्ध के खिलाफ आवाजें उठीं। जंग के खिलाफ किताबें लिखी गईं और फिल्में बनाई गईं। इसका असर राजनीति और समाज पर भी पड़ा। लेकिन भारत में कोई युद्ध विरोधी आंदोलन कभी अपने पैर नहीं जमा सका। पहले विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ने के लिए 10 लाख से ज्यादा भारतीय गए थे। दूसरे विश्व युद्ध में तो यह संख्या 25 लाख से ज्यादा रही। कोहिमा और मणिपुर में जापानी फौज की हार ही उन युद्धों से जुड़ा ऐसा वाकया है, जो भारत के बेहद करीब हुआ। यूरोप और अमेरिका जैसे हालात भारत में नहीं दिखे। इंडिया गेट ऐसा ही स्मारक है, जो ब्रिटिश इंडियन आर्मी के उन 84 हजार सैनिकों की याद में बनाया गया था, जो पहले विश्व युद्ध में मारे गए थे। इंडिया गेट पर उनमें से 13 हजार 313 सैनिकों के नाम भी लिखे हैं। भारत अगर विश्व गुरु बनना चाहता है, तो उसे कुछ अलग मूल्य अपनाने होंगे। इंडिया गेट के पास सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा लगाए जाने से बाकी दुनिया हैरान है। सुभाष चंद्र बोस ने तो भारत में ब्रिटिश शासन का खात्मा करने के लिए इतिहास के दो सबसे क्रूर निजामों से हाथ मिलाया था। नाजी जर्मनी और साम्राज्यवादी जापान के शासन से लोग आज भी नफरत करते हैं। सुभाष बाबू का मकसद भले ही अच्छा था, लेकिन उसे हासिल करने का यह तरीका अच्छा नहीं था। अब हमें गणतंत्र दिवस समारोह में बदलाव से शुरुआत करनी चाहिए। संविधान में इंसाफ, आजादी, बराबरी और भाईचारे के जिन आदर्शों की बात की गई है, उन्हें हासिल करने की दिशा में हमने जो कुछ काम किया है, रिपब्लिक डे पर उसका जश्न मनाएं। इस मौके पर हमें शपथ लेनी चाहिए कि जो कमियां रह गई हैं, उन्हें दूर करेंगे।


