राहुल गांधी जी कभी बैंकाॅक, कभी इटली, कभी इंडोनेशिया तो कभी अमेरिका बिना किसी को भी बताए चले जाते है।इन सब जगहो पर कभी गर्मी, कभी सर्दी मे वे छुट्टीयां मनाने जाते है।जैसे वे कोई आम जनता या आम नेता हो।वे शायद बार बार यह भूल जाते है कि वे भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी के प्रमुख नेता है!
मुझे याद आता है,राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना पार्टी के शुरुआती दौर की बात है,मुंबई के उत्तर भारतीयो मे राज ठाकरे का एक तरह का खौफ पैदा हो गया था,तब राहुल गांधी जैसे नेता ने मुंबई के लोकल ट्रेन मे यात्रा करके उत्तर भारतीयो के मन मे हिम्मत पैदा की थी,उस वक्त वे पहले और शायद इकलौते नेता थे जिन्होंने राज ठाकरे की सोच का विरोध किया था।…मै तो उनका कायल हो गया था,आज वो राहुल गांधी कही खो गए है।ये वही राहुल गांधी है जो कभी आम जनता की आवाज हुआ करते थे,उनकी हिम्मत उनकी ताकत हुआ करते थे।तब मैं गर्व से उनकी बहुत बाते किया करता था! …….खैर
राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता को अपने समाज और राजनीतिक जरूरत के मुताबिक ही सक्रिय होना, आराम करना, छुट्टी मनाना होता है।किसान आंदोलन के समय जब सचमुच किसानो को उनकी जरूरत थी, वे बीच मे ही नानी के घर छुट्टी मनाने चले गए।
आज जब कामकाज के मसले पर लोगो मे नरेंद्र मोदी की सरकार के प्रति थोडी नाराजगी जाहिर हो रहे है,वे अमेरिका और स्पेन की यात्रा पर निकल पड़े है,इस तरह छुट्टी का अवसर निकालना देश और जनता के काम के प्रति राहुल गांधी की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है?
और यह पहली बार नही हुआ है,कई बार जब किसी मुद्दे पर लोगो के आक्रोश को हवा देने की जरूरत महसूस होती है,एक बेहतरीन नेता के तौर पर राहुल गांधी मोर्चे से गायब पाए जाते है।पता चला कि वे छुट्टी मनाने कही चले गए है,इससे जनता मे गलत संदेश जाता है,जनता सोचती है कि वे अपनी सुविधा के अनुसार मुद्दे उठाते है!बडे लिडर के पास यह चाॅईस नही होती है,उसे तो अपने रूख से जनता मे यह संदेश देना होता है कि उसने जनहित मे अपनी सुख सुविधाए छोड दी है,ऐसे ही नेता के पिछे जनता गोलबंद होती है।….
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी इस जगह राहुल गांधी से मीलो आगे है,आज भारत की अधिकतर जनता नरेंद्र मोदी के पिछे लामबंद खडी है,तो इसका मुख्य कारण है कि भारतीय जनता को यह विश्वास हो गया है कि वे उनके साथ हमेशा हर परिस्थिति मे खडे है!बस यही राहुल गांधी चुक रहे है! मुझे पता है यह बात मोदी विरोधीयों को नागवार गुजरेगी, लेकिन सच्चाई यही है।जनता द्वारा नेता के पिछे गोलबंद होने मे अरविंद केजरीवाल और नितीश कुमार भी कुछ हद तक राहुल गांधी पर बीस ही पडते है,अफसोस ये राष्ट्रीय पलत पर नही है।
काग्रेस चाहती तो किसान आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन का रूप दे सकती थी, उसके पास अपने आप को फिर से खडा करने का बेहतरीन मौका था, मोदी सरकार के खिलाफ जनता के आक्रोश को एक संगठित आकार दे सकती थी,लेकिन राहुल गांधी यहा चुक गए।पिछले दस सालो का मेरा अनुभव है कि राहुल गांधी हर संवेदनशील मुद्दे पर पहल करते है और फिर बीच मझधार मे ही उस मसले को छोड़ भी देते है।
जिस तरह से आंदोलन और राजनीतिक जमीन पाने के मौके छोड़कर राहुल गांधी हर बार विदेश भाग भाग जाते है,बाकी कांग्रेसी नेताओ का अनुसरण करने की भी जहमत नही उठाते है,इस से यह साफ लगता है कि वे कुछ सिखना नही चाहते, उनमे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमजोरी ही झलकती है।कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओ मे एक तरह की निराशा ही घर करते जा रही है,वो पुराना जोश खत्म हो रहा है क्योंकि आखिर मे जमीनी स्तर पर जनता का सामना तो उन्हे ही करना पडता है।
धीरज फूलमती सिंह
वरिष्ठ स्तंभकार-मुंबई


