
नीरजा तिवारी
(कवयित्री व लेखलखनऊ)
मानव जीवन एक निरंतर बहती हुई धारा है, और इस धारा की हर एक बूंद अपने अतीत से जुड़ी हुई है। हम अक्सर अपने जीवन की सफलताओं, अपने व्यक्तित्व और अपनी पहचान का श्रेय स्वयं को या अपनी समकालीन परिस्थितियों को देते हैं। लेकिन यदि हम गहराई से विचार करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि “वो कल थे, तो आज हम हैं।” हमारा अस्तित्व, हमारा शरीर और हमारा संपूर्ण व्यक्तित्व वास्तव में हमारे पूर्वजों (पितरों) की ही देन है; हम उन्हीं के तो अंश हैं।
वंश परंपरा और संस्कारों की अटूट कढ़ी जीवन की जो डोर सदियों से चली आ रही है, हम सब उसी विशाल श्रृंखला की एक-एक कड़ी हैं। हमारे पूर्वजों ने न केवल हमें जीवन दिया, बल्कि हमें एक सांस्कृतिक और नैतिक पहचान भी प्रदान की। हमारे गुण, धर्म, रीत-रिवाज़ और संस्कार—सब उन्हीं की धरोहर हैं। हम अनजाने में ही सही, लेकिन हर दिन अपने आचरण और विचारों में उन्हीं के दिए संस्कारों और परंपराओं को जीते हैं। सही मायनों में, हम अपने पितरों के ही जीवंत प्रतीक हैं।
- अदृश्य ऋण और आत्मिक जुड़ाव
यह सच है कि हमने अपने सभी पुरखों को नहीं देखा है। काल चक्र के कारण कई पीढ़ियों की यादें धुंधली हो जाती हैं, लेकिन उनका ऋण हमारे ऊपर सदा बना रहता है। उन्होंने अपने जीवन में जो संघर्ष किए, जो ज्ञान अर्जित किया और जो सुख-समृद्धि हमारे लिए छोड़ी, उसने हमारे आज के मार्ग को सुगम बनाया है। भले ही वे आज भौतिक रूप से हमारे सामने नहीं हैं और हमें दिखाई नहीं देते, लेकिन एक आत्मिक विश्वास कहता है कि वे हमेशा अपनी स्नेही नज़रों से हमें देखते रहते हैं।पितृ परंपरा में यह मान्यता है कि पूर्वजों का अपनी संतान से जुड़ाव कभी समाप्त नहीं होता:
- उन्नति पर प्रसन्नता: जब हम जीवन में प्रगति करते हैं, अच्छा आचरण करते हैं, तो उनकी आत्मा को असीम संतोष और प्रसन्नता मिलती है।
- अवनति पर दुख: जब हम सही मार्ग से भटकते हैं या कष्ट में होते हैं, तो वे दुखी होते हैं।
- सदा अभय और सहारा: अपनी संतानों के प्रति उनका प्रेम निश्चल होता है; वे हर परिस्थिति में अपना अदृश्य सहारा और आशीर्वाद हमें प्रदान करते हैं।
- कृतज्ञता का बोध: समय की मांग आज के आधुनिक युग में हम ‘फ्रेंडशिप डे’, ‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’ जैसे न जाने कितने दिवस मनाते हैं और अपनों के प्रति प्रेम व्यक्त करते हैं। यह एक अच्छी पहल है, लेकिन इसके साथ ही हमें उन पितरों को भी कभी नहीं भूलना चाहिए जिनकी वजह से आज हमारा अस्तित्व है। यदि नींव ही न हो, तो महल खड़ा नहीं हो सकता; ठीक उसी प्रकार यदि पूर्वज न होते, तो हमारा आज भी संभव न होता।
- समर्पण और श्रद्धा का भाव
पितरों के प्रति सच्चे नमन का अर्थ केवल औपचारिकता निभाना नहीं है, बल्कि हृदय से कृतज्ञ होना है। आओ, हम सब मिलकर:
हृदय से नमन करें कि उन्होंने हमें यह जीवन और पहचान दी।
कृतज्ञता व्यक्त करें कि उनके दिए संस्कारों के कारण हम आज सही मार्ग पर हैं।
क्षमा मांगें यदि अनजाने में हमसे कोई ऐसी भूल हुई हो जिससे उनकी मर्यादा या परंपरा को ठेस पहुंची हो।
उनका आशीर्वाद लें ताकि हम जीवन में सही राह पर चलते हुए समाज और कुल का नाम रोशन कर सकें।
हमारे पितर हमारी जड़ों के समान हैं। जो वृक्ष अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही हरा-भरा रहता है और फल-फूल देता है। आइए, अपने पूर्वजों की स्मृतियों को संजोएं, उनके दिए संस्कारों को सहेजें और श्रद्धापूर्वक कहें—
सर्व पितृभ्यो नम: (सभी पितरों को बारंबार नमन)!


