
राजेश विक्रांत
साहित्यकार व व्यंग्यकार
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग में उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्यरत डॉ नितेश धवन ने लखनऊ विश्वविद्यालय से समाज कार्य में डॉक्टरेट, दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क से एम.फिल. किया है व लगभग 25 वर्षों के समृद्ध प्रशासनिक अनुभव के साथ उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार तथा भारत सरकार के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया है। उन्होंने उद्यमिता विकास के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय कार्य किए हैं। एक प्रतिष्ठित लेखक के रूप में, डॉ. धवन ने 10 पुस्तकों की रचना की है, जिनमें शैक्षणिक एवं साहित्यिक दोनों विधाएँ सम्मिलित हैं।
उनकी पुस्तक ‘गीता दर्शन: जीवन रूपांतरण के 18 सूत्र’ का उद्देश्य गीता दर्शन के बहुमूल्य ज्ञान को सरल, सहज और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करना है ताकि पाठक गीता को केवल ग्रंथ के रूप में न पढ़ें, बल्कि उसके प्रत्येक सूत्र को अपने जीवन में आत्मसात कर सकें। क्योंकि गीता का ज्ञान वह परम तत्व है, जो जीवन को सार्थक, उद्देश्यपूर्ण और आनंदमय बना सकता है।
लेखक के अनुसार गीता का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि जीवन दर्शन और व्यावहारिक मार्गदर्शन के रूप में भी अपार है। यह सिखाती है कि जीवन केवल भोग और उपभोग का नाम नहीं है, बल्कि आत्मा की शुद्धि और परमात्मा से मिलन का माध्यम है। यह ग्रंथ मनुष्य को मोह से मोक्ष की यात्रा पर अग्रसर करता है।
गीता का संदेश हमें यह समझने में सहायता करता है कि संसार एक मायाजाल है, और आत्मा इस माया से परे शाश्वत एवं अमर है। जब व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, तो वह मोह, लोभ, क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या जैसे विकारों से ऊपर उठकर शांति और संतोष का अनुभव करने लगता है। गीता यह भी स्पष्ट करती है कि जीवन का सबसे बड़ा धर्म है-निष्काम भाव से कर्म करना- “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” का यह उपदेश मनुष को कर्मयोग की ओर प्रेरित करता है।
बता दें कि जीवन प्रबंधन में गीता का अप्रतिम योगदान है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन-दर्शन है। यह हमें मोह से मोक्ष तक, अज्ञान से ज्ञान तक और अशांति से आनंद तक की यात्रा का बोध कराती है। गीता का उपदेश हमें यह समझाता है कि संसार मायामय है और आत्मा उससे शाश्वत एवं अमर है जब व्यक्ति सत्य को जान लेता है तो वह जीवन के संघर्षों में संतुलन बनाए रखना है और अपने उद्देश्य की ओर बढ़ता ही रहता है।
पुस्तक के अध्याय- विषाद योग: मोह के कारण विषाद की उत्पत्ति, सांख्य योग: स्वधर्म का ज्ञान होने और उसमें दृढ़ रहने से विषाद से मुक्ति, कर्म योग: निष्काम कर्म द्वारा मन और आत्मा की शुद्धि, ज्ञानकर्म सन्यास- कर्म, विकर्म और अकर्म: कर्म, विकर्म और अकर्म को समझने से अकर्ता का भाव उत्पन्न होता है, कर्म सन्यास योग: कर्मयोग सर्वश्रेष्ठ मार्ग और इसमें फल त्याग आवश्यक है, आत्मसंयम योग: विकर्म को एक विधि के रूप में ध्यान द्वारा आत्म संयम की प्राप्ति, ज्ञान-विज्ञान योग: ज्ञान से जानो, विज्ञान से मानो और भक्ति से पाओ,
अक्षर ब्रह्म योग: ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के मूल रहस्यों का प्रकटीकरण, राजविद्या योग: कर्मयोग और भक्तियोग का सुंदर संयोग, विभूति योग: हर श्रेष्ठता और सुन्दरता में ईश्वर की उपस्थिति, विश्वरूप दर्शन योग: ईश्वर की विराटता को देखकर भक्ति और प्रतीत का बोध, भक्तियोग: प्रेम, समर्पण और शुद्ध आचरण से की गयी भक्ति, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग: शरीर क्षेत्र है, आत्मा क्षेत्रज्ञ और ब्रह्म जानने योग्य है, गुणत्रय विभाग योग: तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण को पहचानने और उसके पार जाना ही आत्म उन्नति का मार्ग है,
पुरुषोत्तम योग: शरीर रूपी पुर में अधिष्ठापित पुरूषोत्तम को जानने भक्ति और कर्म के द्वारा प्राप्ति का योग,
देवासुर संपत्ति विभाग योग: निर्भयता और नम्रता के दैवीय गुणों से अपने कर्मपथ पर अग्रसर होने का मार्ग,
श्रद्धाश्रय विभाग योग: श्रद्धा में सात्विकता, कर्म में सेवा भाव और समस्त फलों का ईश्वर को समर्पण तथा
मोक्ष सन्यास योग: स्वधर्म पालन, फल त्याग, और ईश्वर के प्रति समर्पण से मोक्ष की प्राप्ति है।
एक समर्पित लोक सेवक, लेखक और शिक्षाविद् डॉ. नितेश धवन ने बड़े मनोयोग से गीता दर्शन का सृजन किया है। पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में मनुष्य के लिए जीवन संदेश तथा अध्याय का सारांश है। अंत में गीता के ज्ञान अमृत से निकले 18 सूत्र हैं जो हमारे जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं। पुस्तक का प्रकाशन भारत बुक सेंटर, लखनऊ ने किया है। 152 पृष्ठ की इस पुस्तक का मूल्य 195 रुपए है।


