शासन-प्रशासन और न्याय-व्यवस्था आदि जनता की भाषा में चलती आई हैं। लेकिन विदेशी आक्रांताओं और शासकों द्वारा स्थानीय भाषा के बजाए अपनी भाषा को स्थापित करने की प्रवृत्ति रही है। इस प्रकार की शासन व्यवस्थाओं में विदेशी शासकों को मुख्य उद्देश्य जनहित के स्थान पर अपनी सत्ता को स्थापित करना और जनता की सुविधा के स्थान पर शासक वर्ग की सुविधा होती है। लंबे पराधीनता-काल में भारत शासन प्रशासन, न्याय आदि में अपनी भाषाओं को स्थापित करने से वंचित रहा है। इसलिए विश्व के विभिन्न भागों में विदेशी शासकों द्वारा अपनी सत्ता को सुहढ़ आधार प्रदान करने के लिए सदा से भाषा को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। भारत में इस्लामी शासकों ने भी वही किया। 712 ई. में मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध कर आक्रमण किया तो उसके साथ अरबी भाषा आई, जो मजहबी ग्रंथों, मजहबी शिक्षा और मदरसों की भाषा बनी। ईरान से फारसी आई जो राजभाषा और साहित्य व प्रशासन की भाषा बनी। मध्य एशिया से तुकों, अफगानिस्तान से पश्तो आदि भाषाएं आई। विदेशी आक्रमणकारियों ने जहां कहीं भी अपनी सत्ता स्थापित की, वहां किसी न किसी प्रकार अपने धर्म-संस्कृति और भाषा को स्थापित किया। इस्लामिक शासकों ने शासन प्रशासन के लिए मुख्यतः फारसी का प्रयोग किया। लेकिन जनता के साथ संवाद की आवश्यकता के लिए दिल्ली, जो कि उस समय सत्ता, व्यापार-व्यावसाय और सैन्य गतिविधियों का केंद्र थी, यहां की प्रचलित भाषा और बाहर से आई इस्लामिक भाषाओं के शब्दों से मिलकर लश्कर की भाषा के रूप में एक नई मिश्रित भाषा बनी, जिसे उर्दू कहा गया। अंग्रेजों के आगमन तक भी शासन प्राशासन में फारसी और उर्दू का प्रयोग होता रहा। औपनिवेशिक काल की सबसे बड़ी शक्ति थे अंग्रेज, जिन्होंने विश्व के बहुत बड़े भूभाग पर अपना शासन कायम किया और अंग्रेजी भाषा को स्थापित किया। लेकिन बिना स्थानीय भाषा जाने शासन – प्रशासन चलाना आसान न था। इसलिए उस समय भी जो वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी भारत में आते ये, वे हिंदी सहित भारतीय भाषाएँ सीखते थे। निचले स्तर पर हिंदी, उर्दू, बंगाली आदि स्थानीय भाषाओं का प्रयोग होता था, परंतु उच्च प्रशासनिक कार्यों और नीतिगत निर्णयों में अंग्रेजी प्रमुख थी। भारत एक विशाल देश है और राज्यों का संघ है इसलिए वहां की व्यवस्था संघ के स्तर पर संघ की राजभाषा में और राज्यों के स्तर पर राज्यों की भाषा या भाषाओं में होनी चाहिए। जनतांत्रिक मूल्य स्थापित करने के लिए भारत के संविधान के भाग-17 में इसके लिए उपबंध किए गए हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार देवनागरी में लिखित हिंदी भाषा को भारत संघ की राजभाषा बनाया गया, लेकिन साथ में यह भी कहा गया कि 15 वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग किया जाएगा। लेकिन इसी अनुच्छेद के भाग-3 में यह उपबंध भी किया गया कि संसद अधिनियम के माध्यम से उसे अधिनियम में वर्णित प्रयोजनों के लिए 15 वर्ष के बाद भी, उसमें निर्धारित अवधि के लिए हिंदी के साथ अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकेगा। तब किसी ने सोचा न था कि आगे चलाकर इस उपबंध के माध्यम से ऐसी व्यवस्था बनेगी कि अंग्रेजी चिरकाल के लिए भारत में आधिकारिक भाषा के रूप में कार्य करने लागेगी। संघ के स्तर पर शासन-प्रशासन में संघ की राजभाषा स्थापित करने के लिए 1975 में गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा विभाग की स्थापना की गई। विभाग का प्रारंभ हिंदी प्रशिक्षण से हुआ। आगे चलाकर अनुवाद, राजभाषा नीति के कार्यान्यवन के अतिरिक्त भाषा-प्रौद्योगिकी, अनुसंधान पत्रिका अनुभाग आदि स्थापित हुए। हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह जी की दूरदृष्टि के चलते एक महत्वपूर्ण कार्य यह हुआ कि राजभाषा विभाग में भारतीय भाषा अनुभाग की स्थापना की गई, इससे राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में संवाद, समन्वय और भाषाई समरसता का मार्ग प्रशस्त होगा। इससे देश में शासन-प्रशासन में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने में मादद मिलेगी। राज्यों के स्तर पर राज्य सरकारों द्वारा भी अपने राज्यों में राज्य की भाषा को शासान-प्रशासन में लागू करने के प्रयास किए गए। सिद्धांत रूप में इस बात पर किसी को आपति न होगी कि भारत का समस्त कार्य भारतीय भाषाओं में होना चाहिए। लेकिन इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि क्या हम संविधान की भावना और लक्ष्यों को प्राप्त कर सके हैं? दूसली महत्वपूर्ण बात यह है कि जब हम जनहित के लिए जनता की भाषा में सभी व्यवस्थाएं उपलब्ध करवाने की बात करते हैं तो निजी क्षेत्र को इससे बाहर कैसे रखा जा सकता हैं? जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए निजी क्षेत्र में जनभाषा के प्रयोग के विधिक उपबंध किए जाने की आवश्यकता है। विधि एवं न्याय व्यवस्था के साथ-साथ वित्तीय व्यवस्था और शिक्षा व रोजगार आदि में भारतीय भाषाओं को स्थापित किए बिना हम जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरुप भारत की व्यवस्था में भारतवासियों को न्यायसंगत रूप से उनके अधिकार नहीं दे पाएंगे।


