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एक नई और अच्छी पहल

हम जब भी कोई फिल्म देखते हैं तो यह देखकर बड़ा दुख होता है कि हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा की फिल्म का नाम और कलाकारों के नाम आदि विवरण केवल अंग्रेजी में होता है। हिंदी फिल्मों और टीवी सीरियलों में यह प्रवृत्ति सर्वाधिक रही है। मराठी, हिंदी, गुजराती,  तेलुगू, तमिल, मलयालम, उड़िया अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा की फिल्म देख रहे व्यक्ति को अंग्रेजी भाषा आती ही होगी यह जरूरी नहीं। हमारे देश में आज भी आबादी के 80 फीसदी लोगों को अंग्रेजी नहीं आती। इस प्रकार यह न केवल उस भाषा का और उस भाषा के दर्शकों का अपमान है, जिस भाषा की फ़िल्म निर्माता बनाते हैं,  बल्कि यह कलाकारों और दर्शकों के साथ भी अन्याय है। मगर अंग्रेजी की बेतुकी  भेड़चाल के सामने सब बेबस हैं।  समझ नहीं आता कि क्या किया जाए। यही चलन भारतीय भाषाओं के धारावाहिकों का भी है। हिंदी के मेगा धारावाहिकों रामायण और महाभारत में भी कलाकारों के नाम अंग्रेजी में ही होते थे। महाभारत धारावाहिक के जमाने में सीरियल की सिनॉप्सिस को लेकर धारावाहिक की प्रोडक्शन टीम से मेरी तू – तू, मैं – मैं भी हो चुकी है। यह बात इतनी बढ़ी कि डॉ. राही मासूम रजा और धारावाहिक के निर्माता निर्देशक बी. आर. चोपड़ा तक को इसमें दखल देनी पड़ी, तब कहीं जाकर मामला शांत हुआ। उस दौर में शायद यह उनकी मजबूरी रही हो, जैसा कि स्वयं बी. आर. चोपड़ा ने स्वीकार किया। इतना ही नहीं उस दौर में तो कलाकारों को हिंदी डायलॉग भी रोमन भाषा में लिख कर दिए जाते थे। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड जिसे आप सब सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं। उनके किसी कार्यक्रम में अतिथि के रूप में जाना हुआ तो मैंने वरिष्ठ अधिकारियों के सम्मुख अपनी यह बात रखी थी। लेकिन उऩ्होंने कहा, साहब यह तो हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है। आपकी बात सही है, लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते।  एक अर्से बाद करीब दो वर्ष पूर्व की बात है जब मैं केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के  कार्यालय में व्याख्यान देने के लिए गया था। व्याख्यान के पश्चात मेरी वहां के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी से भाषा संबंधी कई विषयों पर चर्चा हुई। मैंने अवसर देख कर फिर वही मुद्दा उठाते हुए उनसे कहा कि आप  ऐसा कोई प्रावधान क्यों नहीं करते कि धारावाहिकों और फिल्मों के शीर्षक उसके कलाकारों के नाम आदि उसी भाषा में दिए जाएं जिस भाषा का वह कार्यक्रम, धारावाहिक या फिल्म है।  वरिष्ठ  प्रशासनिक अधिकारी ने मेरी बात से सहमति जताते हुए अपने कक्ष में लगा टीवी चालू किया और मुझे एक दो टी.वी. कार्यक्रम दिखाए जिनमें कार्यक्रम जिस भाषा में था, कलाकारों आदि का विवरण भी उसी भाषा में ही दिया गया था। उन्होंने बताया कि कुछ समय पूर्व ही इस प्रकार के निर्देश जारी किए गए हैं और अभी उनका पालन हो रहा है। यह कुछ समय पहले ही कर दिया गया है, लेकिन शायद हमारा ध्यान उस पर नहीं गया था। मैंने इस कार्य के लिए उन्हें बधाई दी। मैंने कहा कि फिल्मों में भी इसी प्रकार फिल्म का नाम और कलाकारों के नाम आदि फिल्म की भाषा में ही दिए जाने चाहिए। उन्होंने सहमति जताते हुए कहा कि बात तो एकदम सही है, लेकिन काम थोड़ा मुश्किल है। फिर भी वे इसके लिए पूरा प्रयास करेंगे। मैंने इस संबंध में बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी से मिलने की बात कही। पता लगा कि वे उस दिन कार्यालय में नहीं थे। उन्होंने कहा कि वे इस संबंध में बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी से भी चर्चा करेंगे और मंत्रालय को भी मेरे सुझाव के बारे में अवगत कराएंगे। शायद कोई रास्ता निकले। उनकी बातों में भारतीय भाषाओं के प्रति आत्मीयता भी थी और गंभीरता भी। इसके बाद कई बार फोन पर इस बारे में उनसे बात भी हुई। फिर बात आई-गई हो गई। मैं भी भूल गया। फिर कुछ दिन पहले ही जब यह समाचार मिला कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने फिल्म का नाम और कलाकारों आदि का विवरण फिल्म की ही भाषा में लिखने के निर्देश दिए हैं तो जानकर बहुत खुशी हुई। तुरंत उस प्रशासनिक अधिकारी की याद हो आई, जिन्होंने इस दिशा में प्रयास करने की बात कही थी। मगर अफसोस, इतने समय बाद मैं उनका नाम भी भूल गया। जब नाम याद नहीं तो फोन नंबर कैसे मिलता? लेकिन उन्हें और  केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड तथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय के वे सभी अधिकारी जिनका इस निर्णय में योगदान है, उन्हें मेरी तरफ से तथा सभी भारतीय भाषा प्रेमियों और भारतवासियों की ओर से इस निर्णय के लिए हार्दिक धन्यवाद। उम्मीद की जा सकती है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के इस निर्णय के बाद भारतीय भाषाओं की फ़िल्मों में शीर्षक और आभार सूची अब फ़िल्म की ही भाषा में दिखेंगे।

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