कैसे भाग्यश्री, विवेक ओबेरॉय और राहुल भट्ट ने तोड़ी टाइपकास्टिंग की दीवारें
मुंबई (स भा): हिंदी सिनेमा में अक्सर कलाकारों को एक बार की गई भूमिका के अनुसार परिभाषित कर दिया जाता है। लेकिन कुछ सितारे ऐसे भी हैं, जिन्होंने इस रिवाज़ को चुनौती दी और दर्शकों को यह दिखाया कि एक कलाकार की पहचान किसी एक छवि तक सीमित नहीं हो सकती। भाग्यश्री, विवेक ओबेरॉय और राहुल भट्ट जैसे कलाकारों ने अपने करियर में ऐसे किरदार निभाए हैं, जिनसे उनकी बहुआयामी प्रतिभा सामने आई।
बॉलीवुड में टाइपकास्टिंग लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रहा है। आम तौर पर जब कोई अभिनेता एक खास किरदार में हिट हो जाता है, तो उसे बार-बार वैसी ही भूमिकाएं दी जाती हैं। इसका कारण यह डर होता है कि प्रयोगात्मक भूमिकाएं बॉक्स ऑफिस पर असफल हो सकती हैं। लेकिन विवेक ओबेरॉय जैसे कलाकारों ने इस डर को गलत साबित कर दिया है। ‘साथिया’ में रोमांटिक हीरो से लेकर ‘कंपनी’ में गैंगस्टर, ‘मस्ती’ में कॉमेडी और ‘कृष 3’ में खलनायक तक, उन्होंने विविध किरदारों में दर्शकों को प्रभावित किया। विवेक मानते हैं कि टाइपकास्टिंग से बचने के लिए जरूरी है कि अभिनेता हर बार खुद को चुनौती दे।
इसी तरह भाग्यश्री ने भी अपने करियर में बदलाव लाया। ‘मैंने प्यार किया’ की भोली-भाली नायिका के बाद उन्होंने लंबा ब्रेक लिया, लेकिन वापसी पर उन्होंने ‘राधे श्याम’ और ‘थलाइवी’ जैसी फिल्मों में नए तरह के किरदारों को चुना। भाग्यश्री कहती हैं कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि वो एक्टिंग में लौटेंगी, लेकिन जब मौका मिला तो उन्होंने ऐसी भूमिकाएं कीं जो उन्हें पहले नहीं मिली थीं। वे रणवीर सिंह की भी सराहना करती हैं, जो हर बार नए और चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने से नहीं घबराते।
इन कलाकारों की बातें इस बात की गवाही देती हैं कि अगर अभिनेता अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलने का साहस करे, तो बॉलीवुड में टाइपकास्टिंग की बेड़ियों को तोड़ा जा सकता है। आज का दर्शक बदलाव के लिए तैयार है और कलाकारों से भी वही उम्मीद रखता है – हर बार कुछ नया, कुछ अलग।


