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मणिपुर में जातीय हिंसा की वजह

खसखस यानी पोस्ता की खेती भारत के कई उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रचलित है, ख़ासकर वहां के दूर-दराज इलाक़ों में। इसी पोस्ता से तैयार होती है अफीम। सरकारी एजेंसियों ने पोस्ता की खेती को रोकने के लिए कई कोशिशें भी कीं, लेकिन वे नाकाफी रहीं। हालांकि कहीं पर भी पोस्ता की खेती इतनी संगठित नहीं, जितनी मणिपुर में। और, यही मणिपुर में हो रही जातीय हिंसा की एक बड़ी वजह भी है।
अब सवाल उठता है कि प्रतिबंधित होने के बावजूद मणिपुर में पोस्ता की खेती कैसे हो रही? इसकी खेती किस समुदाय के लोग करते हैं? इसका उग्रवादियों और म्यांमार के लोगों से क्या संबंध है? कई रिपोर्ट्स और रिसर्च बताते हैं कि मणिपुर में किसानों के एक वर्ग को ज़्यादा मुनाफे के लिए पोस्ता की खेती करने को प्रेरित किया गया। हाल ही में मणिपुर में शोधकर्ताओं ने अध्ययन के बादअपनी रिपोर्ट बीते साल केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद को सौंप दी। शोध से कई सारी बातें निकलकर सामने आई हैं। सबसे बड़ी यही कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेज एक्ट, 1985 के अंतर्गत पोस्ता की खेती मणिपुर में प्रतिबंधित है। लेकिन, शोधकर्ताओं के निष्कर्ष और मणिपुर सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि प्रतिबंध के बावजूद पोस्ता की खेती राज्य के पहाड़ी और इंफाल वैली के कुछ इलाक़ों में भी फैल गई है। इसमें कई समुदाय शामिल हैं। साल 2018 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य में ड्रग्स के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था ताकि पोस्ता की तस्करी, अवैध खेती और खपत पर अंकुश लगाया जा सके। दरअसल मणिपुर में मिट्टी की गुणवत्ता और जलवायु परिस्थितियां इसे पोस्ता की खेती के लिए बेहद अनुकूल बनाती हैं। रिसर्च में कृषि या बागवानी से जुड़े काम के बजाय पोस्ता की खेती हो रही है, क्योंकि एक तो अफीम के उत्पाद छोटे होते हैं। दूसरा, इनके दामों में उतार-चढ़ाव भी बहुत ज़्यादा नहीं होता। फिर भले ही खेती की लागत ज़्यादा हो और इसकी अधिक देखभाल करनी होती हो। शोधकर्ताओं ने खेतों में जाकर भी जांच-पड़ताल की। पता चलता है कि एक किसान को अच्छी फसल पाने के लिए हर साल जुलाई और मार्च के बीच करीब 8-9 महीने तक पोस्ता की खेती करनी होती है। पौने 2 एकड़ की ज़मीन पर इसकी खेती की लागत एक लाख 34 हज़ार रुपये के करीब आती है। अध्ययन के मुताबिक, पोस्ता की खेती में श्रम अधिक लगता है। पौने दो एकड़ की ज़मीन पर खेती और कटाई से जुड़े कामों को करने के लिए लगभग 317 लोगों की ज़रूरत होती है। श्रम पर खर्च करीब 97 हज़ार रुपये है, खेती की कुल लागत का 72 फ़ीसदी। पोस्ता की खेती की तैयारी अगस्त से शुरू हो जाती है। पहले खरपतवार नाशक का छिड़काव करते हैं। इसके बाद खेत को तीन हिस्सों में बांट दिया जाता है। फिर जनवरी में किसान तीनों भागों में मज़दूरों के साथ फसल काटते हैं। मज़दूरों के खर्च के अलावा, किसान को पौधे के लिए आवश्यक पोषक तत्वों , सामान्य नमक समेत बाकी रसायनों , औजारों-उपकरणों और बीजों पर भी पैसा खर्च करना पड़ता है। पौधे के लिए पोषक तत्वों पर कुल व्यय का 16 फ़ीसदी खर्च होता है। सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला रासायनिक उर्वरक डायमोनियम फॉस्फेट है। इसके बाद नाइट्रोजन फर्टिलाइजर यानी यूरिया और पोटाश है। रिसर्च में पाया गया कि किसानों ने इन उर्वरकों को आपस में मिलाया। फिर अक्टूबर से दिसंबर के बीच तीन बार इस्तेमाल किया। पौने दो एकड़ के एक प्लॉट में पोस्ता की खेती करने पर साढ़े तीन से पांच किलो तक अफीम पैदा की जा सकती है। अफीम, पोस्ता के पौधे से निकला एक काला चिपचिपा तरल पदार्थ होता है। इसकी क़ीमत 45 हज़ार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये प्रति किलो तक जा सकती है। कई बार तो यह साढ़े छह लाख तक भी पहुंच जाती है। अफीम के मूल्य में कितना ही उतार-चढ़ाव आ जाए, किसान को नुकसान कभी नहीं होता। कटाई के मौसम में यानी जनवरी से मार्च के दौरान, लाभ 23 हज़ार से लेकर सवा 2 लाख रुपये प्रति डेढ़ एकड़ होता है। वहीं, पीक सीजन में यानी सितंबर से नवंबर के दौरान यह लाभ बढ़कर 75 हज़ार रुपये से सवा पांच लाख रुपये तक पहुंच जाता है। अध्ययन के मुताबिक, कोई अन्य फसल किसानों को इतना अधिक मुनाफा नहीं दे सकती। पहाड़ी क्षेत्रों में क़ानून व्यवस्था पूरी तरह नदारद रहती है और पोस्ता की खेती के लिए अभी तक कोई दंड भी नहीं है। लिहाजा, पहाड़ी क्षेत्रों में इसका तेज़ी से बढ़ना कोई आश्चर्य की बात नहीं। शोधकर्ताओं ने अपुष्ट रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कई खुलासे भी किए हैं। वे बताते हैं कि मणिपुर के चूराचंदपुर , चंदेल और उखरुल  ज़िलों में म्यांमार के नागरिक इस फसल की कटाई करने आए थे। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने भी ऐसी ही राय पेश की थी। मई महीने में राज्य और केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि मणिपुर में जातीय हिंसा की शुरुआत अफीम की खेती पर कार्रवाई की वजह से हुई, जिसमें म्यांमार के अवैध प्रवासी और पहाड़ी ज़िलों में नशीली दवाओं का कारोबार भी जुड़ा हुआ था। एन. बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली राज्य सरकार का दावा है कि 2017 के बाद से अब तक 18 हज़ार एकड़ से अधिक के पोस्ता के खेतों को नष्ट कर दिया गया है। इनमें से अधिकांश पहाड़ी ज़िलों में हैं। राज्य पुलिस की एक विशेष इकाई, मणिपुर नारकोटिक्स एंड अफेयर्स ऑफ बॉर्डर के मुताबिक, पोस्ता की खेती का क्षेत्र बढ़ रहा है। यह 2017 में ढाई हज़ार एकड़ से बढ़कर इस साल तक करीब साढ़े 15 हज़ार एकड़ हो गया है। एक सरकारी अधिकारी का दावा है कि मणिपुर में बड़े पैमाने पर पोस्ता की खेती होती है। और, ऐसा बाहर से आने वाली फंडिंग और कई मध्यस्थों की वजह से होता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि चीन , म्यांमार, बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों की नशीली दवाएं बेचने वाले समूह ने मणिपुर के किसानों को पोस्ता की खेती के साथ-साथ हेरोइन और ब्राउन शुगर के लिए भी फंडिंग की।

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