भारत देश की पहचान दिल्ली। जहां पर लोगों को धर्म और जाति के आधार पर नहीं बल्कि लोगों के हुनर और काम के आधार पर पहचान मिलती है। वही दिल्ली धर्म के नाम पर इस तरह से जली की फिर बस अंत में शोक और शर्म बस यही बाकी रह गया।
एक देश जहां के लोग विश्व शक्ति बनने का सपना देख रहे हैं। यदि उस देश की राजधानी में लोगों द्वारा धर्म के आधार पर हिंसा को बढ़ावा दिया जाए। फिर क्या छवि प्रस्तुत होगी पूरी दुनिया में उस देश की।
हम अपने ही देश की राजधानी में अपने ही लोगों को मरते और घर छोड़ते हुए देखते रहे। दिल्ली राज्य और केंद्र दोनों की सुरक्षा में रहतीं हैं फिर भी दिल्ली मैं 3 दिन तक मौत और दहशत का गंदा खेल चलता रहा। ना ही राज्य सरकार और ना ही केंद्र सरकार कुछ करती हुई नजर आई। जैसे धर्म के आधार पर होने वाली हिंसा के आगे हमारी सरकार और कानून कमजोर थे।
आज के समय में ऐसा प्रतीत होने लगा है। कि हम बाहर से लाखों दुश्मनों से लड़ सकते है, उन्हें सज़ा दे सकते है। किन्तु जब कोई हमारे ही बीच में ग़लत करता है तो हम उसका कुछ नहीं बिगाड़ा सकते है। करीब एक महीने में तीन बार शाहीन बाग में चल रहे प्रर्दशन में गोली चलाना। उन्हें कोई सज़ा ना देना और फिर अब पूर्वी दिल्ली के भाग में दंगों में गोली लगने से लोगों की जान जाना। बिना किसी डर के पुलिस वाले के सामने बंदूक दिखाना, गोली चलाना। शायद हमारे लाचार होने की गवाही दे रहे है।
हम वोट दे सकते है एक सरकार चुन सकते है। लेकिन जब देश में कुछ ग़लत हो हमारे अपने मारे जाएं तब सवाल नहीं कर सकते है। बस अपनों के साथ गलत ना होने की उम्मीद के अलावा। हमारे देश की सरकार और सुरक्षा व्यवस्था आज इतनी कमजोर क्यों हो गई है कि देश को बचाने के लिए, लोगों को सुरक्षा देने के लिए हमारी अदालतों को आना पड़ रहा है।
दिल्ली दिल वालों की से ना जाने कब उन नफ़रत वालों की हो गई। जिन्होंने हजारों लोगों के जीवन को उजाड़ दिया। अपनी नफ़रत में मासूम लोगों की जीवन भर की मेहनत को ही नहीं वल्कि लोगों की जानें भी ले ली। मरने वालों की और घायलों की संख्या के आंकड़े से आप को यह हिंसा शायद बड़ी ना प्रतीत हो। लेकिन जब आप यह समझने का प्रयास करेंगे कि देश की राजधानी में धर्म के नाम पर तीन दिन तक यह सब होता रहा। तब आप समझ सकेंगी कि यह बहुत ही ग़लत हुआ है।
दिल्ली में पिछले तीन दिनों से हो रही हिंसा में मारे गए लोगों में कुछ अलग तो बहुत कुछ साझा था। अलग मजहब, कद-काठी, उम्र भी अलग-अलग। अलग इलाकों के रहने वाले। साझा था तो सपना, अपने परिवार का भरण-पोषण और भविष्य संवारना। अपने गांव-कस्बों में रोजगार नहीं मिला तो अवसर तलाशते हुए ये लोग दिल्ली चले आए। दिल्ली के बाहरी मुहल्लों में बजबजाती नालियां और तंग गलियों में बने दड़बेनुमा कमरों में रहने लगे। अचानक एक दिन भीड़ इन्हें घेरकर मार डालती है या किसी तरफ से आई गोली का निशाना बन जाते हैं। बीते चार दिन में मारे गए लोगों की हर कहानी से दर्द का सागर फूटता है।
हमारे देश के युवा पीढ़ी को हम किस ज़हर से भर रहें है। लोग राजनीति फायदे के लिए उन का प्रयोग कर रहे। वक़्त है अपनी सोच बदलने का। धर्म और जाति से ऊपर उठकर यह समझने का कि हम सभी एक देश के वासी है और इस देश के बारे में सोचना हमारा कर्तव्य है। धर्म और जाति के लिए अपने ही देश को और अपने ही देश के लोगों को बर्बाद करने की सोच हमारे लिए लाभ दायक नहीं हो सकती है।
अब वक्त है अपनी सोच को बदलने का। धर्म और जाति से उठकर एक इंसान बनकर एक देश के वासी बनने का। अभी भी हम अपने ज़हन में इस ज़हर को पालते रहें तो आने वाले वक़्त में जो दर्द आज हजारों लोगों का है वह पूरे देश का होगा। दंगों में मौत धर्म और जाति पूछ कर नहीं आती है। -राखी सरोज


