भूकंप जैसी त्रासदी से दुनिया के कई देश गुजर चुके हैं। इन त्रासदियों में जानमाल के साथ – साथ मानवता भी त्राहि – त्राहि कर उठती है। तुर्किये और सीरिया में आए भूकंप का हाल कुछ ऐसा ही है। वहां हुआ नुकसान बढ़ता ही जा रहा है। लगभग 35 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है और आशंका है कि बड़ी संख्या में लोग अब भी मलबे में दबे हो सकते हैं। हर बीतते मिनट के साथ उनके बचने की उम्मीदें कम होती जा रही हैं। हालांकि दुनियाभर से राहत और बचाव की टीमें लगी हैं। भारत से भी एनडीआरएफ की टीम गई है। तुर्किये ने इससे पहले 1939 में ऐसी त्रासदी देखी थी। तब भी धरती हिली थी। इस सदी की बात करें, तो 2001 में भुज, 2004 में हिंद महासागर, 2005 में कश्मीर और 2015 में नेपाल में भूकंप आया था। क्या अब प्राकृतिक आपदा की तादाद बढ़ गई है? भूकंप किस तरह लंबे वक़्त के लिए असर डालते हैं? दक्षिणी तुर्किये के अन्टाक्या में बचावकर्मियों को मलबे से एक हल्की पुकार सुनाई पड़ी। कोई बुला रहा था मदद के लिए। पांच मंजिला इमारत के ढेर में दबी ज़िंदगियों को निकालने के लिए तुरंत ही टीम सक्रिय हो उठी। उनमें से एक कर्मचारी ने हाथ उठाकर आसपास मौजूद लोगों को खामोश रहने का इशारा किया। ‘मर्व, इरम! अंदर तुम लोग हो?’ जवाब में मलबे से घुटी-घुटी आवाज़ बाहर निकली। ‘हिम्मत रखो, तुम लोगों तक हम बस पहुंचने ही वाले हैं।’ बड़ी मेहनत और मुश्किल के बाद दोनों बहनों को उस ढेर से बाहर निकाला जा सका। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्हें पहले तो यह यकीन करने में वक़्त लगा कि वे बच गई हैं। और उसके बाद उनका अगला सवाल था कि क्या वे 14 दिनों से फंसी थीं? समझ सकते हैं कि घुप्प अंधेरे में जब सिर के ऊपर टनों मलबा लदा हो और उम्मीद की कोई किरण नज़र न आए, तब एक-एक पल कितना भारी लगता है। मर्व और इरम को बताया गया कि भूकंप सोमवार को आया था और आज बुधवार है, जब उन्हें बचाया गया। ये दोनों बहनें किस्मत वाली रहीं कि बचावकर्मी सही वक़्त पर दोनों तक पहुंच गए। रेस्क्यू ऑपरेशन में लगे एक शख़्स ने कहा, ‘अगर उन दोनों ने हिम्मत हार दी होती, तो फिर कोई नहीं बचा सकता था उन्हें।’ लेकिन, हज़ारों दूसरे लोग इतने खुशकिस्मत नहीं रहे। तुर्किये और सीरिया की धरती 6 फरवरी को कांप उठी थी। 7.8 तीव्रता का भूकंप आया था। तब से अभी तक दोनों देशों में लगभग 35 हज़ार लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है। बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं और माना जा रहा है कि बहुत-से मलबे में दबे पड़े हैं। हर बीतते पल के साथ उम्मीद टूटती जा रही है। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने कहा भी, ‘हमारे देश में इस समय दुनिया की सबसे बड़ी राहत और बचाव टीम लगी है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि खोज का जो प्रयास होना चाहिए था वह उतना नहीं हो सका।’ इस भूकंप ने क्षेत्र पर हमेशा के लिए अपना निशान छोड़ दिया है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, टैक्टोनिक प्लेट्स की स्थिति में बदलाव के कारण तुर्किये अपनी भौगोलिक जगह से खिसक गया है, करीब 10 फीट। सीरिया की तुलना में थोड़ा धंसा भी है। 6 फरवरी को इस क्षेत्र ने दूसरा सबसे घातक भूकंप झेला था। इससे पहले तुर्किये ने 1939 में देखी थी ऐसी त्रासदी, एर्जिंकन में। लेकिन, अगर हालिया वक़्त के सबसे घातक भूकंप की बात करें, तो चिली में 1960 में जो हुआ, वह ज़ेहन से नहीं जाता। उस भूकंप की तीव्रता थी 9.5 और इसका मतलब है कि तुर्किये में आए भूकंप की तुलना में 50 गुना और भुज की तुलना में 63 गुना घातक। 21वीं सदी में कई उच्च तीव्रता वाले भूकंप दर्ज किए गए हैं। साल 2004 में हिंद महासागर में धरती हिली थी और इसकी वजह से 9.1 तीव्रता का भूकंप आया। तुर्किये से 20 गुना ज़्यादा। इसकी जद में इंडोनेशिया और सुमात्रा के तट थे। लेकिन, असल तबाही तो हुई, सुनामी की उन लहरों के कारण, जो भूकंप से उठी थीं। करीब 14 देशों में 50 मीटर तक ऊंची लहरों ने दो लाख 30 हज़ार लोगों की जान ले ली। दर्ज इतिहास में यह तीसरा सबसे घातक भूकंप है और 21वीं सदी में सबसे ख़तरनाक प्राकृतिक आपदा। डेटा से पता चलता है कि पिछली सदी से भूकंप की संख्या बढ़ गई है। ये बार-बार आ रहे हैं। लेकिन, शायद एक वजह यह भी हो सकती है कि अब तकनीक ज़्यादा अडवांस हो चुकी है। सेंसर ज़्यादा बेहतर हैं। हालांकि अधिक तीव्रता वाले भूकंपों की संख्या में कमी आई है, लेकिन जानमाल का नुकसान अधिक हुआ है। इसकी एक वजह आबादी और निर्माण का बढ़ना है। उदाहरण के लिए, हैती में 2010 में जो भूकंप आया, उसने दो लाख 30 हज़ार लोगों की जान ली। वैसे इसकी तीव्रता सात थी, तुर्किये से कम, एक छठा हिस्सा। हैती दरअसल इस तरह की आपदा से निपटने के लिए तैयार नहीं था। राहत और बचाव कार्य के ढंग से नहीं चलने के कारण बहुतों को जान गंवानी पड़ी थी। भूकंप की वजह से एक तबाही तुरंत आ जाती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव भी हो सकते हैं। 2011 में जापान में 9.1 तीव्रता का भूकंप प्रशांत महासागर में पैदा हुआ। इससे सुनामी आई और फुकुशिमा दाइची परमाणु त्रासदी हो गई। तीन रिएक्टरों में मेल्टडाउन हुए और रेडियोधर्मी पानी समुद्र में छोड़ा गया। आर्थिक नज़रिये से देखें, तो कुल नुकसान हुआ 235 अरब डॉलर का। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह इतिहास की सबसे महंगी आपदा थी। 2020 की एक रिपोर्ट में पाया गया कि इसने जापानी जीडीपी को लगभग 0.5 प्रतिशत अंक तक कम कर दिया।

रेटिंग एजेंसी फिच का अनुमान है कि तुर्किये और सीरिया को तबाह करने वाले भूकंप से दो अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हो सकता है। यह चार अरब डॉलर या उससे अधिक तक भी पहुंच सकता है। इसकी तुलना में 2015 में नेपाल और भारत में आए भूकंप से कुल 7 अरब डॉलर का नुकसान हुआ।


