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ईश्वर तुम्हारा साथ

आपकी खुश्बू हवा में आ रही है

 कल्पना को हर घड़ी महका रही है

 लो मोहब्बत आज फिर करके इशारा

 आपके नजदीक हर पल ला रही है

        ….. सुबह के 3:00 बजे हैं  | हां, मैं जानती हूं , सुबह के 3:00 बजे है , बिल्कुल | पर आज मैं खुद को रोक नहीं पाई | यू ही मन हुआ तुमसे आज कुछ अलग तरीके से बात करने का | या फिर यूं कह लो इन लम्हों को मैं संजो के रखना चाहती हूं , जो मुझे यह तुम्हारे मेरे साथ होने का एहसास कराते हैं | आजकल जब भी मैं तुमको महसूस करती हूं तो अक्सर क्षितिज को देखने का मन होता है , कभी देर रात मौका मिलने पर बालकनी से ,  कभी अपने कमरे की खिड़की से | हां मेरी कल्पना में जो क्षितिज उभरता है वह चमकते हुए तारों को अपने आंचल में समाए हुए दिखता है | उन तारों को देख कर मेरी आंखें भी एकाएक चमक उठती है  | मैं महसूस करती हूं उन चमकते तारों को देखते हुए ,  इस धरा पर तुम्हारा मेरे साथ होना |

          आत्मा के गहरे जुड़ाव के साथ उन क्षणों में मुझे लगता है मैं पूरी हो गई हूं | यही बात है जो मेरे मन को गहरी सांस के साथ एक लंबी शांति प्रदान करती है | उन लम्हों , उन पलों , उन घण्टो के लिए जब हम एक होते हैं | आजकल मेरे चेहरे पर जो शांति का भाव उभरता है , जो चमक मेरे चेहरे पर बनी रहती है , उसका कारण सिर्फ तुम्हारा साथ है |

           हां यह बात तो मैं बताना ही भूल गई कि जो आकाश में अपनी खुली आंखों से देखती हूं उसमें मेरी कल्पना में आने वाले आकाश की तरह तारे नहीं होते |  तुमको मालूम है ना दिल्ली में उस तरह तारे नहीं दिखाई पड़ते |

          जब तुम्हारा चेहरा मेरी आंखों में उभरता है तुम मुझको बिल्कुल दूर नहीं जान पड़ते , बिल्कुल मुझमें होते हो तुम | बिल्कुल मुझसे होते हो तुम , एकदम मेरी कॉपी |

          हो सकता है तुम दिखने को मुझसे कुछ किलोमीटर की दूरी पर हो , या फिर सात समंदर पार , या कहीं किसी देव स्थान पर | जो भी है , एक बात तो तय है कि इस वक्त तुम भी जगे हुए हो | तुम्हारी संवेदना को मैं भली-भांति महसूस करती हूं |

         क्या तुमको मालूम है तुम्हारी दैविकता ही मुझे तुम्हारी तरफ खींचती रहती है | भले ही हम कभी मिले नहीं , लोगों के अनुसार |

      ….माफी चाहती हूं तुम मेरे इतने करीब रहते हो कि मैं अक्सर तुम्हारे विषय में सोचते हुए खोई सी रहती हूं | हमारी दुनिया में | कई बार ऐसा होने पर तुम्हारे विषय मैं जब एकाएक किसी से बात कर बैठती हूं लोग तुमको मेरे दिमाग की उपज , कल्पना मात्र मान लेते हैं | पर ये सच तो नहीं | तुम्हारा होने का मुझे किसी को कोई सबूत देने की जरूरत भी नहीं | तुम कितने यथार्थ हो यह तुम भी जानते हो और मैं भी |

         तुम सोच रहे होगे मैं आज अचानक तुमसे यह सब बातें क्यों कर रही हूं | हा मैं जानती हूं हमारे बीच मौन संवाद होता है | शांति , शीतलता और प्रसंता के भाव से सराबोर |

          हम दिखने में बहुत दूर हो सकते हैं | तुम्हारी सत्ता पर भी लोग अंकुश रखते हैं | किंतु हम हैं तो बहुत पास | इतने पास जितनी पास होना खुद में ही किसी करिश्मे से कम नहीं | जहा मैं और तुम का भेद समाप्त होता है |

         यह गहरा प्रेम ही तो हैं तुम्हारे और मेरे , हमारे बीच | तुम दूर होकर भी मेरे सबसे अधिक पास हो | आज जब सुबह के 3:00 बजे मेरी अचानक आंख खुली और मैं तुम्हारे गहरे ध्यान में थी , मैं उसी वक्त समझ गई थी तुम मुझे याद कर रहे हो |

        जब भी कभी तुम मुझे याद करते हो मैं समझ जाती हूं और आज भी ऐसा ही हुआ | आज मैं तुमसे यही कहना चाहती हूं कि मैं जानती हूं आजकल तुम लगातार मेरी चिंता कर रहे हो | मेरी चिंता मत करो यह तो मैं तुमसे नहीं कहूंगी पर यह जरूर बताना चाहती हूं कि मैं कुशल से हूं | मैं यह भी जानती हूं कि तुम भी कुशल से हो | हम कुशल से है क्योंकि हमारा साथ कभी कोई उदासी लेकर नहीं आता , केवल शांति और शांति , अपार शांति |  तुम्हारा साथ पाकर यदि कभी मेरी आंखों में आंसू आए हैं तो वह आंसू भी हमेशा खुशी की ही रहे हैं | तुम्हारे साथ में पक्षियों की चहचहाहट, रंग बिरंगी तितलियां, आकाश में इंद्रधनुष  कि सतरंगी आभा , शंखनाद , झरनो की कल कल , मंदिर की घण्टियों की गुंजन और बादलों के साथ शीतल मन्द ब्यार की सरसराहट के साथ मुझे छू भर जाना मुझे अपार शांति देता है | मैं अक्सर महसूस करती हूं कि तुम एक योगी हो और मैं, मैं किसी जन्म में तुम से बिछुड़ी साधिका |

       …..मैं मानती हूं , यह सब कल्पनाओ मे होता है किंतु मैं बाधित हूं तुमको महसूस करने को | क्योंकि तुम प्रेम का महासागर हो और मैं नदी जो गहन शांति में डूब जाना चाहती हैं  हमेशा हमेशा के लिए |

         मैं इस योग रूपी ईश्वर को आमंत्रण देती हूं फिर अनंत में मिलने की चाह में तुम्हारा ही अमिट छोटा सा हिस्सा |

        ….अपना ख्याल रखना |

मनीषा यादव ” दिल्ली “

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