जब से पांच राज्यों के चुनावी नतीजे सामने आए थे, तब से उत्तर दक्खन की पॉलिटिक्स की बहस चल रही थी। अब इस बहस में दो और मुद्दा जुड़ गया। एक तेलंगाना के सीएम बने रेवंत रेड्डी और दूसरा झारखंड के राज्यसभा सांसद धीरज साहू का। रेवंत रेड्डी ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘तेलंगाना का डीएनए बिहार के डीएनए से बेहतर है।’ तो क्या ऐसा कहकर महागठबंधन को मुश्किल में डाल बैठे हैं रेवंत रेड्डी? आखिर तेलंगाना के नए सीएम ने ऐसा क्या कहा? रेवंत रेड्डी से पहले पीएम मोदी क्या बोले थे बिहार के डीएनए पर? क्यों बार बार बिहार का डीएनए टारगेट किया जा रहा है? बिहार का डीएनए बयान बिहार के लोगों का अपमान है या फिर सत्ता पाने के लिए चली गई राजनीतिक बयानबाजी? ये साल 2015 का अगस्त महीना था। बिहार की राजधानी पटना में जेडीयू और राजद कार्यकर्ताओं ने जगह जगह बड़े बड़े स्टॉल लगाए थे। इस स्टॉल के बाहर आम बिहारी छोटी कैंची, नेल कटर और छोटे छोटे प्लास्टिक पाउच लेकर कतार में खड़े थे। इन छोटे प्लास्टिक पाउच में लोगों के काले-सफेद बाल और नाखूनों के कुछ कटे टुकड़े पड़े थे जिसे वो स्टॉल पर जमा करना चाहते थे। ये शब्द वापसी कैंपेन था, जिसकी पंच लाइन थी-बिहार होने पर गर्व है, डीएनए में कुछ नहीं है। शक है तो जांच करा लो। दरअसल 2015 में ये कैंपेन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बिहार यात्रा के दौरान दिए गए एक बयान के खिलाफ चलाया गया था। उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिए बगैर कहा था कि शायद डीएनए में गड़बड़ी है। नरेन्द्र मोदी ने पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का जिक्र करते हुए कहा था कि जब उन पर जुल्म हुआ तो वो बेचैन हो गए और उन्हें लगा कि शायद डीएनए में ही गड़बड़ी है। जेडीयू राजद कार्यकर्ताओं ने इसके बाद इकठ्ठे किए ये सैंपल प्रधानमंत्री दफ्तर (पीएमओ) में भी बोरियों में भरकर भिजवाया था, लेकिन पीएमओ ने इसे रिसीव नहीं किया। इस घटना के तकरीबन आठ साल बाद एक बार फिर बिहारी डीएनए चर्चा में है। डीएनए यानी डीऑक्सीराइबोज न्यूक्लिक एसिड। ये मनुष्य की कोशिका के गुणसूत्र में पाया जाने वाला अणु है जिसमें मनुष्य की सभी अनुवांशिक जानकारियां दर्ज होती हैं। फिलहाल बिहारी डीएनए की चर्चा की वजह है तेलंगाना के नए नवेले सीएम रेवंत रेड्डी का बयान जो उन्होनें एक माह पहले एक पत्रिका के कॉन्क्लेव में दिया था। दरअसल सीएम बनने से पहले रेवंत रेड्डी से इस कॉन्क्लेव में एंकर ने पूछा था कि आपका डीएनए क्या है, विद्यार्थी परिषद या तेलुगू देशम का डीएनए? इस पर रेवंत ने जवाब दिया कि मेरा डीएनए तेलंगाना का है, केसीआर का डीएनए बिहार का है। वह बिहार के रहने वाले है। वे बिहार से आंध्रप्रदेश के विजयनगरम आए और वहां से तेलंगाना आ गए। केसीआर वेलामा जाति से आते हैं, जो बिहार और उत्तर प्रदेश में कुर्मी कहलाते हैं। केसीआर कुर्मी हैं। उन्होंने निजाम के साथ काम किया, इसलिए तेलंगाना आ गए। तेलंगाना का डीएनए, बिहार के डीएनए से बेहतर है। तकरीबन एक माह पहले दिए गए इस बयान की सुध किसी ने नहीं ली, लेकिन दिसंबर में ये सुर्खियों में आ गया। दरअसल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद लोसकभा में डीएमके सांसद सेंथिल कुमार ने एक टिप्पणी की थी कि बीजेपी की ताकत बस हिंदी पट्टी के राज्यों में है जिसे हम आमतौर पर गोमूत्र राज्य कहते है। सेंथिल कुमार के इस बयान ने तो तूल पकड़ा ही लेकिन इसके बाद रेवंत रेड्डी भी बिहार के नेताओं के निशाने पर आ गए। केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री और बिहार के उजियारपुर से सांसद नित्यानंद राय ने इसे बिहारियों का अपमान बताते हुए नीतीश सरकार को भी लपेट लिया। वहीं बेगूसराय से बीजेपी सांसद गिरीराज सिंह ने भी कहा कि तेलंगाना के सीएम बिहार के डीएनए को गाली दे रहे हैं। राहुल गांधी और नीतीश कुमार क्या कर रहे हैं? दूसरी तरफ राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने कहा कि राजनीति में डीएनए पर सवाल उठाने की परंपरा भाजपा के भगवान मोदी ने शुरू की है। आज जो भी बिहारियों के डीएनए पर सवाल उठा रहे हैं उसकी हम घोर निंदा करते हैं। दिलचस्प है कि साल 2015 में डीएनए को लेकर कैंपेन चलाने वाले बिहार के मुखिया नीतीश कुमार ने चुप्पी साध रखी है और इंडिया गठबंधन का मुख्य दल कांग्रेस विधानसभा चुनाव में बैकफुट पर आकर असहज स्थिति में है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ केसीआर का डीएनए बिहार से जोड़ा गया है। इससे पहले मुंबई गए बिहारी मजदूरों का विरोध करने वाले बाला साहब ठाकरे का डीएनए भी बिहार के मगध इलाके से जोड़ा गया था। साफ है कि रेवंत रेड्डी का बिहारी डीएनए का बयान तेलंगाना की स्थानीय राजनीति को साधने से प्रेरित है। लेकिन इस बयान ने इंडिया गठबंधन के भविष्य को थोड़ा ही सही लेकिन झटका तो दिया ही है।


