सुप्रीम कोर्ट में बढ़ी कानूनी हलचल
नई दिल्ली (सं. भा.) : सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करने का संकेत दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से इस मुद्दे को चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष रखा। उन्होंने आग्रह किया कि यह मामला अति गंभीर है और इसकी शीघ्र सुनवाई की आवश्यकता है। इसके प्रत्युत्तर में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वे दोपहर में उल्लेख पत्र देखेंगे और सुनवाई की तारीख तय करेंगे।
बजट सत्र में संसद द्वारा पारित किए गए वक्फ संशोधन विधेयक, 2025 को हाल ही में राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई है। इसके बाद यह कानून प्रभावी हो गया है और अब इसे “यूनिफाइड वक्फ मैनेजमेंट, इम्पावरमेंट, एफिशिएंसी एंड डेवलपमेंट (उम्मीद) अधिनियम, 1995” के नाम से जाना जाएगा। इसके तहत वक्फ बोर्ड की संरचना, अधिकार और दायित्वों में बदलाव किए गए हैं, जिन्हें मुस्लिम संगठनों और कई राजनेताओं ने अल्पसंख्यक अधिकारों के खिलाफ बताया है।
इस अधिनियम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, आप विधायक अमानतुल्लाह खान, जमीयत उलेमा-ए-हिंद और अन्य संगठन शामिल हैं। इन याचिकाओं में कहा गया है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26, 29 और 300ए का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह कानून मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता, संपत्ति के अधिकार और धार्मिक संस्थाओं के स्वशासन के अधिकार को प्रभावित करता है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इस विधेयक को मुसलमानों की धार्मिक आज़ादी पर हमला बताया है। उन्होंने कहा कि यह कानून सीधे-सीधे संविधान पर प्रहार है और इसीलिए जमीयत इसे न्यायालय में चुनौती दे रही है। उन्होंने यह भी बताया कि देश की अन्य राज्य इकाइयाँ भी संबंधित उच्च न्यायालयों में इस कानून के खिलाफ याचिकाएं दाखिल करेंगी।
वहीं केंद्र सरकार ने इस कानून का बचाव किया है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि यह कानून किसी भी मुस्लिम व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता बल्कि इसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता को सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि यह सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ की नीति के तहत कार्य कर रही है और मुसलमानों को इस कानून से लाभ मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले को सूचीबद्ध करने की तैयारी ने कानूनी और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। यह मामला केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के संवैधानिक मूल्यों जैसे धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकार और संपत्ति के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है। अब सभी की निगाहें इस पर हैं कि सर्वोच्च न्यायालय इस संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या यह कानून आगे भी वैध बना रहेगा या इसमें संशोधन की आवश्यकता महसूस की जाएगी।


