स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से ही लोगों ने यह सोचा था कि अब देश में अपनी सरकार होगी अपने चुने हुए प्रतिनिधि देश का सर्वांगीण विकास स्वतंत्रता पूर्वक करने में सफल होंगे। अंग्रेजी हुकूमत तो देश के इंफ़्रास्ट्रक्चर का उतना ही विकास की थी, जितनी कि उसे आवश्यकता थी, किंतु स्वदेशी सरकारें तो आजादी के बाद से ही देश का बंटाधार करती आ रही हैं। भारतीय संविधान में यह व्यवस्था संविधान लागू किये जाने के बाद से ही की गई थी कि १० वीं तक की शिक्षा हर बालक को नि:शुल्क उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी केन्द्र व राज्य सरकारों की होगी, किंतु किसी भी सरकार ने शिक्षा के लिये संविधान प्रदत्त कर्तव्यों का अनुपालन नहीं किया है। जनसंख्या बढ़ती रही। रही सही शिक्षा व्यवस्था भी तंग होती गई। सरकारें शिक्षा को कोई महत्व नहीं दी हैं। क्योंकि शिक्षा विभाग ही ऐसा रहा है, जिससे सरकारों को किसी भी मद से आय की गुंजाइश नहीं थी। पहले की देश भर में व्याप्त निरक्षरता, काफी कुछ साक्षरता में बदली, किंतु एक विकासशील देश के लिए शिक्षित प्रशिक्षित नागरिक तैयार करने में सरकारें विफल ही रही हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में विफलता के कई कारण चिंतकों ने बताये हैं, जिनमें कुछ निजी शिक्षण संस्थान एवं वी आयपी शिक्षण संस्थान प्रमुख रहे हैं। ऐसे शिक्षण संस्थानों में आम परिवारों के छात्रों की पहुंच ही नहीं थी। शासन कर रहे राजनेताओंव नौकरशाहों की संतानें तो व्यवस्थित विद्यालयों में शिक्षण प्राप्त करती थीं, जबकि गरीब परिवारों के होन हार बच्चे मात्र अभाव ग्रस्त सरकारी स्कूलों में ही अपना भविष्य बर्बाद करने को अभिशप्त थे। साथ ही अपनी असफलताओंपर पर्दा डालने को सरकारों ने निजी स्कूलों, विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्व विद्यालयों को थोक में मान्यता देना आरम्भ किया जो आज तक एक शासकीय परम्परा बन चुकी है। धर्म आधारित शिक्षण संस्थानों को मान्यता देना, देश को अभिशापों की गहरी खाई में झोंकता था। वर्तमान में सरकारी शिक्षण संस्थानों की अपेक्षा निजी संस्थानों की संख्या बढ़ कर १० गुनी से भी अधिक हो चुकी है, जिन पर कोई शासकीय नियंत्रण नहीं रह गया है। अच्छे व सुव्यवस्थित विद्यालयों में मात्र संपन्न परिवारों के बच्चों को ही स्थान मिलता है, जब कि गरीब परिवारों के योग्यतम् बच्चे उनमें प्रवेश पाने में असफल रह जाते हैं। निजी विद्यालयों के लिये शिक्षण एक कमाऊँ उद्योग बन कर रह गया है, किंतु अब भी कोई सरकार देश के गिरते भविष्य के बारे में नहीं सोच रही है। निजी शिक्षण संस्थान तो चौतरफा लूट मचाकर ‘कोरोना वायरस’ से भी घातक बन चुके हैं।
देश में योग्यतम् नागरिकों की घटती संख्या का कारण निजी शिक्षण संस्थान तो हैं ही, सरकारों की अकर्मण्यता के चलते ‘कोचिंग क्लासेस्’ भी कुकुरमुत्ते की तरह उग आये हैं। यानि कि शिक्षा क्षेत्र दोहरी लूट का शिकार हो रहा है। जब कि वर्तमान ग्लोबल डिजिटलायजेशन में तकनीकी शिक्षण का महत्व बढ़ा है, जिसमें भी तकनीकी शिक्षण संस्थानों की लूट एवं कोचिंग क्लासेस की लूट के चलते योग्य व्यक्ति या छात्र, पीछे रह जा रहा है। क्योंकि लूट नियंत्रण विहीन है और ‘कोचिंग क्लासेस’ शिक्षण संस्थानों की अव्यवस्था का लाभ उठाकर छात्रों व उनके अभिभावकों की मनमानी लूट कर रहे हैं। यदि ‘शिक्षण संस्थानों’ में योग्य शिक्षण व्यवस्थायें रहती तो ‘कोचिंग क्लासेस’ का वजूद ही न पैदा होता! इस तरह शिक्षण संस्थानों व कोचिंग क्लासों का लाभ भी चंद संपन्न परिवारों के ही छात्रों को मिल पा रहा है, जब कि योग्य ‘छात्र’ शिक्षण प्राप्त करने का अवसर ही नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं। व नागरिकों की चिंता किसी सरकार या शिक्षण संस्थान को है?
सरल जवाब है ‘कत्तईं नहीं’!


