
नन्दिनी रस्तोगी ‘नेहा मेरठ
स्वतन्त्रता के बाद आपराधिक कानूनों में परिवर्तन तो हुए लेकिन समयानुकूल काम अपूर्ण ही रहा । केन्द्र सरकार ने तीन नये आपराधिक कानूनों को हरी झंडी दिखाई है। नये कानूनों में भारतीय न्याय संहिता दंड संहिता की जगह लेगी, वहीं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता आपराधिक प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम पुराने इण्डियन एविडेंस एक्ट की जगह लेगा। इन कानूनों पर संसद ने भी मुहर लगा दी। केन्द्र के भगीरथ प्रयासों से आपराधिक कानूनों के भारतीयकरण और मानवीयकरण के साथ ही उन्हें समय के अनुरूप सुसंगत भी बनाया गया है, जो कानून पुराने समय से कायम थे। नये कानूनों में दंड से अधिक न्याय की भावना पर जोर दिया गया है। यह परिवर्तन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस दृष्टिकोण के अनुरूप भी है कि अंग्रेजी राज के सभी कानूनों की समीक्षा के साथ ही अनावश्यक है। कानूनों को तिलांजलि दी जायेगी।समयानुकूल परिवर्तन तो हुए जैसे निर्भया हत्याकांड में जब उम्र का मसला आया तो आपराधिक कृत्यों के मामले में किशोरों की उम्र घटाकर 18 से 16 वर्ष कर दी गई। सातवें और आठवें दशक में भी दहेज हत्या से जुड़े प्राविधान में भी परिवर्तन किया गया था । इन परिवर्तनों के बावजूद किती सरकार ने आपराधिक कानूनों और आपराधिक न्याय प्रणाली के भारतीय दृष्टिकोण से कायाकल्प करने और अंग्रेजी ठप्पे को छुड़ाने के बारे में गम्भीरता से विचार नहीं किया।

नये कानूनों में तलाशी और जब्ती अभियान के दौरान पुलिस के लिये उसकी रिकार्डिंग कराना अनिवार्य किया गया है। मोबाइल फोन की रिकार्डिंग या पेन ड्राइव,वे रिकॉर्ड बयान को साक्ष्य के रूप में मान्यता देगा । साक्ष्य जुटाने में फोरेंसिक साइंस के उपयोग को प्रोत्साहन देना भी सराहनीय कदम है। इलेक्ट्रानिक और गवाही की रिकार्डिंग आरोपितों के पक्ष को बेहतर रूप से रखेगी और इससे सुनवाई की प्रक्रिया में तेजी भी आयेगी। ये सभी आरोपितों के मनवाधिकारों से जुड़े हैं।
सीआरपीसी की जगह नये कानून में जेल अधीक्षकों को भी यह अधिकार दिया गया कि वे विचाराधीन कैदियों की रिहाई पर भी विचार कर सकते हैं,जो कैदी अपने मामलों में अधिकतम दी जाने वाले सजा का एक तिहाई समय जेल में पहले ही काट चुके हों। अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों को भी नये कानूनों में अपराध के दायरे से बाहर किया गया है। सरकार ने राजद्रोह को आपराधिक कृत्यों से बाहर करने की मांग के साथ ही देश की अखण्डता और सम्प्रभुता को चुनौती देने वाली गतिविधियों पर भी ध्यान दिया है।

राजद्रोह अपराध नहीं लेकिन राष्ट्रद्रोह की गतिविधियां करने वाला
कड़ी सजा का हकदार है। आइपीसी में राजद्रोह से जुड़ी धारा (धारा-124 ए) में भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा अवमानना या असंतोष उत्पन्न करने या भड़काने का प्रयास करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्राविधान है। यदि कोई भारत की एकता या अखण्डता को खतरे में डालता है तो उसे आजीवन कारावास या सात वर्षों की सजा दी जायेगी । धारा-302 ने धारा-316 का स्थान लिया और धारा – 420 ने धारा – 99 का स्थान निधारित किया।


