ज़रूरी नहीं कि रोशनी में हर चीज़ साफ़ दिख जाए। कई बार कुछ देखने के लिए परछाइयों की ज़रूरत पड़ जाती है। जोशीमठ के आकाश पर जब बादल घुमड़ते हैं और उनकी परछाई सामने वाले पहाड़ों पर पड़ती है, तो काली चट्टानों के उतार-चढ़ाव से एक दृश्य उभरता है। मानो कोई सुंदरी लेटी हो (स्लीपिंग ब्युटी)। लेकिन, अब इस स्लीपिंग ब्युटी को छोड़कर कई लोग यहां से जा रहे हैं, सुरक्षित ठिकानों की तलाश में। यह पूरा शहर दो हिस्सों में बंटा नज़र आ रहा है अब। एक हिस्सा, जो आपदा का शिकार है और दूसरा जो इस आपदा को धीमे-धीमे बढ़ता देख रहा है। उसे डर है कि कहीं वह भी इसकी जद में न आ जाए। जोशीमठ में जिन लोगों के घर रहने के लायक नहीं बचे, उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा है। कई लोग ख़ुद ही शहर छोड़कर जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब जोशीमठ के लिए कोई उम्मीद नहीं बची? प्रभावित लोगों के रहने की व्यवस्था कहां हो रही है? किन इलाक़ों में ज़्यादा नुकसान हुआ है? इस धार्मिक शहर की एक पहचान बन चुकी है यह पत्थरों की स्लीपिंग ब्युटी। जैसे मुंबई में समुद्र की एक क़ीमत है। यहां के लोग कहते हैं ऐसी खिड़की वाला कमरा चाहिए, जिससे समुद्र दिख जाए, तो उसके लिए ऊंचा दाम देना पड़ता है। ठीक उसी तरह जोशीमठ में ढलते सूरज के समय बालकनी में बैठकर चाय के कप के साथ स्लीपिंग ब्यूटी को निहारने की क़ीमत बाकी जगहों से जरा ऊंची है। यहां कई होटल और लॉज हैं, जिनकी मार्केटिंग ही इस नाम से होती है कि कमरे की खिड़की से सोती हुई सुंदरी दिख जाती है। शहर में घुसने के मुख्य रास्ते पर पुलिस ने बैरिकेडिंग कर रखी है। हर आने वाले से हाथ जोड़कर बस यही कहा जा रहा, ‘रास्ता सुरक्षित नहीं, पत्थर गिर रहे हैं।’ पूरा ट्रैफिक डायवर्ट किया जा रहा है औली रोड पर, जहां से एक रास्ता वापस नीचे की ओर, जोशीमठ के लिए कटा है। इस बैरिकेडिंग की वजह हैं यहां के दो प्रमुख होटल- मलारी इन और माउंट व्यू। ये वही दोनों होटल हैं, जो फिलहाल टीवी चैनल्स पर भरपूर फुटेज पा रहे हैं। आपस में बिल्कुल मिले हुए, एक-दूसरे की ओर झुके हुए। दोनों के बीच का जो फासला था, अब वह ख़त्म हो गया है। ऊपर की मंजिलें एकदम सट चुकी हैं। धीरे-धीरे करके खिड़कियों, दरवाजों, टीनशेड वगैरह को हटाया जा रहा है। चुनौती है कि दोनों होटल को एक-साथ गिराना है। एक भी अगर पहले गिरा, तो दूसरा अपने आप भरभराकर पीछे बसी आबादी पर जा गिरेगा। इन होटल के आगे और पीछे, जोशीमठ में पहाड़ की चोटी से लेकर नीचे घाटी तक एक पूरा हिस्सा है, जो दरक रहा है। इसमें सबसे ऊपर है मनोहर बाग, फिर सुनील वॉर्ड, सिंहधार, नीचे गांधी नगर और मारवाड़ी गांव। पहाड़ के ऊपर से नीचे तक, इस पट्टी में रहने वाले कई लोग अपने घर छोड़कर जा चुके हैं या फिर जा रहे हैं। प्रशासन ने जोशीमठ में ही तमाम होटल और गेस्ट हाउस में अस्थायी तौर पर रहने की व्यवस्था की है इन लोगों की। जिन लोगों के गांव, घर कहीं और हैं, वे पूरी तरह वहां शिफ्ट हो रहे हैं। सिंहधार रोड पर कई जगह कुछ नई दरारें उभरने लगी हैं। हालांकि यह बहुत चौड़ी नहीं, लेकिन पिछले कुछ दिनों में जिस तेज़ी से ज़मीन धंसना शुरू हुई है, उसे देखते हुए हल्की लकीर भी आशंका से भर देती है। आजकल जोशीमठ में सबसे बड़ी दहशत ही लाल रंग के क्रॉस की। प्रशासन ने पूरे शहर को कई सेक्टर में बांट रखा है और लगातार सर्वे किया जा रहा है। ख़तरे वाले जोन में तमाम मकानों पर इस तरह का निशान लग चुका है। यहां से जा रहे लोगों के पास इतनी पूंजी नहीं कि कहीं और अपने से इंतज़ाम कर सकें। अब उम्मीद इस बात पर टिकी है कि सरकारी मदद क्या और कितनी मिलती है। शहर के ऊपरी हिस्से मनोहर बाग में पहाड़ का दरकना ज़्यादा साफ़ महसूस किया जा सकता है। सड़कों की दरारों को तो भरने की कोशिश हो रही है, लेकिन खाली खेत जो फट रहे हैं, उन्हें कौन भर पाएगा? पहाड़ पर घर बनवाना कितना मुश्किल है, इसे वही समझ सकता है, जिसने बनवाया हो। अब आगे के बारे में सोचना है। बस सरकार थोड़ी मदद कर दे। लेकिन, सभी लोगों में इतना हौसला नहीं कि वे इतने बड़े नुकसान को बस एक ठंडी आह के साथ भुला दें। वे आवाज़ उठा रहे हैं। प्रदर्शन तहसील में हो रहा था, लेकिन गूंज पूरी घाटी रही थी। नेशनल थर्मल पावर प्लांट को वहां से जाने के लिए कहा जा रहा है। ‘एनटीपीसी गो बैक’ के नारे रह रहकर लग रहे हैं।



