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थप्पड़ संस्कृति: लोकतंत्र की घातक विकृति

वर्तमान लोकसभा चुनाव -2019 के मतदान का पांचवां चरण पूरा हुआ है अभी दो चरणों का मतदान शेष है किंतु अनेक भविष्यवक्ता अभी से अपना राग अलापना शुरू कर दिये हैं। फिलहाल मतदान का कार्यक्रम जैसे-जैसे पूरा तो हो ही जायेगा एवं 23 मई को परिणाम भी आ जायेंगे किंतु यह चुनाव कुछ गंभीर सवाल छोड़े जा रहा है, जिसका निराकरण सभी राजनेताओं एवं सर्वसामान्य जनता को करना आवश्यक है ताकि `मतदान’ के समय तथा दलों के प्रचार प्रसार में पार्टियों के कार्यकताओं द्वारा एक-दूसरे पर हिंसक हमले न हों, किसी भी जाति-धर्म एवं आर्थिक स्तर के व्यक्ति पर अपमान जनक टीका-टिप्पड़ी न हो एवं आप नेता अरविंद केजरीवाल की तरह भविष्य में किसी राजनेता पर स्थाही, अंडे व टमाटर फेंकने तथा थप्पड़ मारने की घटना न हो, जिससे की भारतीय लोकतंत्र, गुंडातंत्र के रूप में कुख्यात न हो जाये।
अनेक लोगों को दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पर मारा जाने वाला थप्पड़ मनोरंजक रहा हो, किंतु अनेक जागरूक एवं बौद्धिक लोगों को कत्तईअच्छा नहीं लगेगा। ऐसी घटनाओं पर यदि कठोरतम दण्डात्मक कार्यवाई नहीं की जाती तो लोगों पर से अपने ही लोगों का विश्वास उठ जायेगा एवं लोकतंत्र के नाम पर अराजकता को बढ़ावा मिलेगा । गाली-गलौज, थप्पड़ मारने एवं जान से मारने की घटनायें यदि बढ़ती जाती हैं तो यह अपने आप सिद्ध हो जायेगा कि भारत जैसे अशिक्षित एवं निरंकुश देश में आदमी के महत्व को नकारने का षडयंत्र fकया जा रहा है। यह भी साबित होता है कि लोकतंत्र जैसी `पावन शासकीय व्यवस्था सर्वथा ही अनुपयोगी है। लोकतंत्र की सफलता के लिये आवश्यक हैं कि देश के सर्व सामान्य नागरिको का रहन –सहन, सभ्यता एवं संस्कृति उत्तमोत्तम बनी रहे। ताकि नागरिक लोकतंत्र एवं राजनेताओं के महत्व को समझे। मात्र देश के नागरिकों में ही सुधार की आवश्यकता नहीं है अपितु राजनेताओं को भी आत्म मंथन करना चाहिए कि किसी राजनेता पर अपमान जनक टिप्पड़ी, गाली-गलौज, थप्पड़ मारने तथा जान से मारने के लिए लोग उद्यत न हों! ऐसा तभी सम्भव है, जब राजनेता आदर्श जीवन वाला, सत्य एवं मृदु भाषी, लोकतंत्र एवं राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी तथा नेक एवं ईमानदार है यही बातेें सर्वसामान्य नागरिकों पर भी लागू होती हैं कि वे देश –राष्ट्र, समाज एवं मानवीय आदर्शो के प्रति सहज एवं उत्तरदायित्व पूर्ण प्रवृत्ति के हों।
यह जानना कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं, कि कोई व्यक्ति किसी राजनेता से इस कदर नाराज हो जाता है कि उसके पास हाथ-पाव चलाने के अलावां कोई अन्य विकल्प बचता ही नहीं है। दिल्ली के मुख्य मंत्री केजरी वाल न तो बहुत बड़े धनाढ्य हैं, न गुंडा या माफिया हैं तथा ना ही उन्होंने कोई दुष्कृत्य किया है, फिर उनसे किसी का क्या बैर हो सकता है? जहां तक उनके संबंध में जानकारी है, वह एक संघर्ष शील व्यक्ति रहे हैं तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करके ही दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे हैं। यदि भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करना किसी को अपराध प्रतीत होता है तो निश्चय ही वह व्यक्ति भ्रष्ट एवं अपराधी प्रवृत्ति का है। उसे केजरीवाल जैसे संघर्ष शील नेता से इतना भय क्यों है, जो वह केजरीवाल को डरा धमका एवं अपमानित कर, उन्हें `सत्ता’ से परे हटाना चाहता है। भारत में भाजपा एवं कांग्रेस दो ही राष्ट्र स्तरीय दल हैं, अनेक राज्य स्तरीय दल भी है किंतु यह देखा जाता है कि केजरीवाल या उनके दल `आम आदमी पार्टी’ का नाम आते ही सभी की त्योरियों चढ़ने लगती है। सुप्रसिद्ध समाज सेवी अन्ना हजारे ने भी केजरीवाल द्वारा आयोजित `भ्रष्टाचार-विरुद्ध आंदोलन में शिरकत कर उनके आंदोलन को प्रमाणिकता प्रदान की थी। सवाल उठता है कि क्या केजरीवाल ही गलत हैं और सारे राजनेता दूध में धुले हुए हैं? चाणक्य ने कहा है कि किसी `राजा’ पर सभी लोग उंगलियां उठाने लगें तो समझिये कि वह राजा सही मायने में अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा है।

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