चीन ने पिछले दिनों बड़ा धमाका कर दिया। सऊदी अरब और ईरान में जब दोस्ती की बात सामने आई, तो पूरी दुनिया हैरान रह गई। यह दोनों ही मुल्क इस्लामिक दुनिया के भीतर चल रहे शीत युद्ध के दो बड़े खिलाड़ी रहे हैं। इनका किसी समझौते पर पहुंचना हैरत में डालता है। उससे भी ज़्यादा हैरत हुई कि यह काम कराया चीन ने। अभी तक इस तरह की डील कराना अमेरिका का काम समझा जाता था। वैसे भी खाड़ी क्षेत्र वॉशिंगटन के प्रभाव वाला रहा है। ऐसे में चीन ने एक तरह से अमेरिका को मात दी है, उसका दबदबा तोड़ा है। लेकिन, क्या इससे मान लेना चाहिए कि अमेरिका कमजोर पड़ गया, हमेशा के लिए हार गया? बीजिंग की जीत में क्या चिंता है भारत के लिए? चीन ने एक असंभव से काम को संभव कर दिखाया। इस्लामिक दुनिया के भीतर चल रहे शीत युद्ध के दो बड़े खिलाड़ियों, सऊदी अरब और ईरान में दोस्ती करा दी। दोनों मुल्कों के प्रतिनिधियों के बीच बीजिंग में चार दिनों तक गुप्त रूप से बातचीत चली। 10 मार्च को जब समझौते का ऐलान हुआ, तो पूरी दुनिया हैरान रह गई। क्या यह देखकर उस गुप्त बातचीत की याद नहीं आती, जो अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर और चीनी पीएम झोउ एनलाई के बीच हुई थी? इसके कारण 1970 के दशक में अमेरिका और चीन के संबंध सामान्य हो गए थे। निश्चित तौर पर चीन का यह क़दम बिल्कुल उसी तरह कूटनीतिक रूप से एक बड़ी चाल है, जैसे कि किसिंजर की चीन के लिए वह उड़ान थी। इस समझौते के ऐलान से पहले, 6 मार्च को चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने पहली बार सीधे तौर पर अमेरिका की अगुवाई वाले पश्चिम को कोसा और उसे अपने देश के विकास के लिए गंभीर चुनौती बताया। फिर, सऊदी अरब-ईरान डील में मध्यस्थता के बाद उन्होंने चीनी सेना को ‘ग्रेट वॉल ऑफ स्टील’ बनाने का संकल्प जताया। यह दृष्टिकोण ज़रूरी था क्योंकि विकास का आधार सुरक्षा ही है। इस डील ने खाड़ी क्षेत्र में चीन की जियोपॉलिटिकल एंट्री दर्शा दी है। कभी यह इलाक़ा अमेरिकी प्रभाव का समझा जाता था। वास्तव में बीजिंग ने इस मौके का इस्तेमाल किया है पश्चिम को नीचा दिखाने के लिए। चीन के शीर्ष राजनयिक वांय यी ने कहा कि दुनिया यूक्रेन मुद्दे तक सीमित नहीं है। यही स्टैंड दिल्ली का भी है, जिस पर पश्चिम की ओर से लगातार दबाव डाला जा रहा है कि वह रूस-यूक्रेन युद्ध में ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभाए। हालांकि, सऊदी अरब और ईरान के बीच डील चीन ही करा सकता था। वजह है कि अमेरिका के ईरान के साथ लंबे समय से राजनयिक संबंध नहीं रहे। वहीं, रूस अभी युद्ध में उलझा है। इसकी वजह से एक शांतिदूत के रूप में उसकी विश्वसनीयता ख़त्म हो गई है। भारत की बात करें तो उसके पास अपेक्षित आर्थिक और कूटनीतिक वजन का अभाव है। सऊदी अरब और ईरान के बीच दोस्ती से क्षेत्र में चल रहे कई छद्म युद्ध भी ख़त्म हो सकते हैं, जो अब पूरे इलाक़े में फैल चुके हैं। मसलन- यमन, लेबननान और सीरिया। भारत और चीन की एक शिकायत रही है कि पश्चिम ने यूक्रेन पर रूसी हमले को जितनी तवज्जो दी, उतना ध्यान कभी दूसरे मसलों पर नहीं दिया। अब जाकर बीजिंग ने कुछ काम किया है, तो निश्चित तौर पर यह बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है। इसके साथ चीन ने कुछ अन्य भू-राजनीतिक लाभ भी हासिल किए हैं। इस्लामिक दुनिया के भीतर तनाव शांत करने से बीजिंग की एनर्जी सिक्योरिटी को सहायता मिलती है। जब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने 2019 में सऊदी के तेल ठिकानों पर हमले किए थे, तो इससे तेल उत्पादन पर बुरा असर पड़ा था। हफ्ते भर में वैश्विक तेल की क़ीमतें 15 फ़ीसदी तक बढ़ गई थीं। दूसरी बातों के अलावा सबसे अहम यह कि बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीयों ने खाड़ी क्षेत्र को अपना घर बनाया हुआ है। खाड़ी में अपनी सफलता से उत्साहित बीजिंग अब सभी खाड़ी देशों का शिखर सम्मेलन आयोजित करना चाहता है। यह देखा जाना बाकी है कि क्या इस तरह के शिखर सम्मेलन के आयोजन की क़ीमत के रूप में वह अपने लिए तेल की क़ीमतों में छूट पर बात करेगा। क्षेत्र की सुरक्षा के एवज में पहले अमेरिका भी ऐसा कर चुका है। अगर चीन ऐसा कर पाया, तो यह भारत के लिए नुकसानदेह होगा। इसके अलावा, अगर इस्लामी दुनिया एक होती है, तो हिंदुस्तान में मुस्लिम समुदाय के साथ हो रहे व्यवहार पर ज़्यादा कड़ी नज़र हो जाएगी। प्रतीक स्वरूप छोड़ दें, तो हक़ीक़त में ऐसा है नहीं। क्षेत्र में उसके मिलिट्री बेस हैं, जिनकी बराबरी चीन नहीं कर सकता। वास्तव में वॉशिंगटन अब दो जगहों पर अपना फोकस कम कर रहा है। पहला तो यूरोप, जहां वह जंग में यूक्रेन की मदद कर रहा है और दूसरी जगह है हिंद-प्रशांत क्षेत्र, जहां चीन उसकी जगह लेना चाहता है। इस्लामी आतंकवादियों के ख़िलाफ़ लड़ाई भी वॉशिंगटन के लिए बीते हुए कल की बात है। साल 2000 में उसे इराक में चोट खानी पड़ी थी, जब चीन ख़ुद को उभार रहा था। अमेरिका अब पुरानी ग़लती दोहराने से रहा। इलाक़े की सिरदर्दी से निपटने के लिए दूसरी शक्तियों के आगे आने से वह संतुष्ट है।



