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क्या मिला हिंडनबर्ग को?

अडानी ग्रुप अपना एफपीओ लाने की तैयारी कर रहा था। बजट के दौरान कंपनी के इस क़दम की काफी चर्चा थी। लेकिन, इसके पहले आ गई हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट। इसमें कई आरोप लगाए गए अडानी ग्रुप पर। असर तुरंत ही दिखा। शेयरों में तेज़ गिरावट शुरू हो गई। इस पूरे घटनाक्रम ने बहस में ला दिया है शॉर्ट सेलिंग को। वैसे यह बहस नई नहीं। जब भी कोई आर्थिक संकट खड़ा होता है, तो शॉर्ट सेलिंग को गैर क़ानूनी घोषित करने की मांग उठने लगती है। क्या यह तरीका वाकई नियमों के ख़िलाफ़ है? क्या नाता है इसका मार्केट एक्टिविस्ट से और भारत में क्या है इतिहास? हिंडेनबर्ग रिसर्च ने साल 2022 में 10 शेयरों की पहचान ओवरवैल्यूड के रूप में की। नतीजा क्या निकला, रिटर्न में 42 फ़ीसदी की गिरावट। हिंडेनबर्ग के दो अभियान साल के दो सबसे बड़े शॉर्ट सेलिंग थे। ईलॉन मस्क की हिचकिचाहट के कारण जब ट्विटर डील फंसती दिख रही थी, तब हिंडेनबर्ग ने कंपनी के ख़िलाफ़ दांव लगाया। बाद में उसने पाला बदला और दोनों तरफ से पैसे कमाए। अब उसने अडानी ग्रुप के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला है। स्टॉक में हेराफेरी समेत कई तरह के आरोप लगाए हैं। जवाब में अडानी समूह ने 413 पन्नों की रिपोर्ट जारी की है। साथ ही, धमकी दी है मुकदमा करने की। इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच अडानी ग्रुप के शेयरों में जबरदस्त गिरावट आई। फाउंडर गौतम अडानी दुनिया के शीर्ष 10 अरबपतियों की लिस्ट से बाहर हो गए। ग्रुप को अपना एफपीओ वापस लेना पड़ा। लेकिन, यह कहानी आरोपों की नहीं है। यह कहानी है कि कैसे संदेह का लाभ उठाकर बड़ी जीत हासिल की जा सकती है। पारंपरिक अर्थों में निवेश के बारे में सोचने पर हम दूर की देखते हैं। हमारी सोच होती है कि यह कंपनी अच्छा करेगी तो इसके शेयर खरीद लिए जाएं। समय के साथ शेयर के दाम बढ़ते जाएंगे। लेकिन, शॉर्ट सेलिंग बिल्कुल अलग चीज़ है। इसमें लगता है कि स्टॉक का मूल्य जितना होना चाहिए उससे कहीं अधिक है। वजह क्या है? शायद इसलिए कि इसकी कमाई पर्याप्त नहीं बढ़ रही या फिर कंपनी कर्ज़ के ढेर पर बैठी है। ऐसे में शेयर्स को ऊंचे दाम पर खरीदने के बजाय उन्हें उधार लिया जाता है। यह तरीका 400 साल पुराना है। दुनिया की पहली जॉइंट स्टॉक कंपनी डच ईस्ट इंडिया कंपनी में हुई थी पहली शॉर्ट सेलिंग। इस कंपनी का कारोबार मुग़ल भारत, बंगाल, चीन और हमारे ज़्यादातर पड़ोसी देशों में फैला था। एक बार कंपनी के एक डायरेक्टर को निकाल दिया गया। कारण स्पष्ट नहीं है। उस डायरेक्टर ने शर्त लगाई कि कंपनी के शेयर गिरेंगे और उसने शॉर्ट पोजिशन ले ली। क़ानूनी तौर पर यह सही था। फिर वह कंपनी के बारे में अफवाहें फैलाने लगा कि प्रोडक्ट ख़राब है, बड़ा घाटा है वगैरह। हालांकि इससे असर नहीं पड़ा और वह अपनी सारी जमा-पूंजी गंवा बैठा। शॉर्ट सेलर्स को हमेशा से इकॉनमी के खलनायक के रूप में देखा गया है। ऐसे में सवाल है कि शॉर्ट सेलिंग गैर क़ानूनी क्यों नहीं? समय-समय पर इस बारे में मांग उठती रही है, ख़ासकर वित्तीय संकटों के दौरान। लेकिन, रिसर्च से जाहिर है कि शॉर्ट सेलिंग पर रोक से सारी समस्याएं ख़त्म नहीं होने वाली। उल्टे इसकी वजह से मार्केट लिक्विडिटी पर असर पड़ सकता है। मुश्किल वक़्त में जब कोई स्टॉक नीचे गिरता है और शॉर्ट सेलर को लगता है कि यह अब सबसे निचले स्तर पर है, तो वह उसे खरीद लेता है। इससे मार्केट को मदद मिलती है। 2007-2009 के वित्तीय संकट के दौरान अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, कनाडा, ताइवान समेत कई देशों ने शॉर्ट सेलिंग पर रोक लगाई थी। उनका मानना था कि इससे स्टॉक के दामों में हो रही गिरावट रुक जाएगी, लेकिन परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं निकले। कुछ निवेशकों का तो मानना है कि शॉर्ट सेलिंग से किसी स्टॉक की सही क़ीमत हासिल करने में मदद मिलती है। अरबपति निवेशक वॉरेन बफेट भी समर्थक हैं शॉर्ट सेलिंग के। अब सवाल है कि बाज़ार की गड़बड़ियों पर निगाह रखने वाली कंपनियों, एजेंसियों या एक्टिविस्ट का शॉर्ट सेलिंग से क्या संबंध? तो, शॉर्ट सेलिंग की प्रकृति ही क्रांतिकारी है। घोटालों का पता लगाते हुए पैसे बनाना। 2010 के आसपास इसमें तेज़ी आई। बहुत खोजबीन के बाद रिपोर्ट जारी की जाती कि फलाने कंपनी के शेयरों में गड़बड़ी है। कई बार मामला बहुत ही गंभीर होता है। शॉर्ट सेलिंग रिसर्च साइट ब्रेकआउट पॉइंट का एनालिसिस बताता है कि 2022 में इलेक्ट्रिक वीकल से जुड़े बिजनेस को लेकर एक्टिविस्ट सबसे ज़्यादा सक्रिय रहे। हिंडेनबर्ग को भी एक बड़ी सफलता इसी क्षेत्र में मिली थी। ऑटोमोटिव स्टार्टअप निकोला ने दावा किया था कि उसने हाइड्रोजन से चलने वाला ट्रक बनाया है। 39 सेकेंड का एक विडियो भी जारी किया था उसने। हिंडेनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि हक़ीक़त में विडियो में दिखाए गए ट्रक में इंजन ही नहीं था और वह पहाड़ी की ढलान से नीचे उतरा। निकोला ने इसका खंडन किया। लड़ाई चली। सिक्योरिटी फ्रॉड जांच के लिए कंपनी भुगतान करने को राजी हो गई और आखिर में 2022 में इसने अपने बैटरी से चलने वाले सारे ट्रक वापस मंगा लिए। बीते साल इसके शेयर्स में 67 फ़ीसदी से ज़्यादा गिरावट आई। भारत में हिंडेनबर्ग के सबसे शुरुआती अभियानों में था बॉलिवुड प्रोडक्शन कंपनी इरोस इंटरनैशनल के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप। जब पहली बार हिंडेनबर्ग ने अनियमितता के आरोप लगाए, तो इरोस ने मुकदमा दायर कर दिया। मामला खारिज हो गया। अगली बार हिंडेनबर्ग ने रिसर्च की, कर्मचारियों से बात कर सबूत जुटाए। इरोस के ख़िलाफ़ जांच बैठी और उसके शेयर गिरते ही चले गए। भारत में स्थिति थोड़ी अलग है। विरोध एक चीज़ है और एक्टिविस्ट ट्रेडिंग दूसरी। कई स्टडी से पता चलता है कि भारतीय शेयरधारक आमतौर पर निष्क्रिय होते हैं। इसके अलावा जब तक किसी मजबूत संगठन का साथ न हो, शॉर्ट सेलिंग महंगी साबित हो सकती है।

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