अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन कहने को तो भारत के करीबी मित्र हैं, लेकिन कई घटनाक्रम बताते हैं कि इन्हें भारत विरोधी गतिविधियों से कोई खास लेना देना नहीं। इन तीनों ही देशों में भारतीय राजनयिक मिशन के बाहर खालिस्तान समर्थकों ने विरोध-प्रदर्शन किया और हमला बोला। लेकिन, किसी भी देश ने मामले को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। अब सवाल उठता है कि अमेरिका, कनाडा या फिर ब्रिटेन जैसे मुल्क खालिस्तान के खिलाफ सीधा एक्शन लेने से क्यों बचते हैं? क्या यह वोट बैंक का मामला है? या फिर ये देश खालिस्तान को अपने लिए खतरा नहीं मानते और उन्हें भारत की चिंताओं से कोई लेना-देना नहीं? पश्चिम के शहरों को मंच नहीं बनना चाहिए ख़तरनाक अभियानों के लिए। पिछले हफ्तों में खालिस्तान के समर्थकों ने भारतीय राजनयिक मिशनों की खिड़कियां तोड़ीं, सैन फ्रांसिस्को में वाणिज्य दूतावास की इमारत को जलाने का प्रयास किया, लंदन में तिरंगे का अपमान हुआ, वॉशिंगटन में भारतीय राजदूत की जान को ख़तरे में डाला और एक पत्रकार पर हमला बोला और मेलबर्न में हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की गई। खालिस्तान समर्थकों ने हर जगह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में नफ़रत फैलाने वाली बातें कहीं। इस आड़ को ख़त्म करने की ज़रूरत है। चरमपंथियों पर निगरानी रखने और उन्हें उनकी मनमानी करने से रोकने के लिए और भी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है। अगर डिप्लोमैटिक फैसिलिटीज के ख़िलाफ़ हिंसा एक दंडनीय अपराध है, तो फिर लोगों को कभी-कभार ही सजा क्यों मिल पाती है? अपराधियों की पहचान या उनके गुनाहों का पता लगाने के लिए सीसीटीवी फुटेज की कोई कमी नहीं होनी चाहिए। अमेरिका में एक चरमपंथी समूह ‘सिख फॉर जस्टिस’ के नेता ने चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को दोस्ताना पत्र लिखते हुए खुलेआम मदद मांगी है। अमेरिकी अधिकारी किसी भी देश पर दया नहीं करते, लेकिन खालिस्तान समर्थकों के मामले में लगता है कि ऐसा नहीं है। हडसन इंस्टीट्यूट की खालिस्तान और पाकिस्तान समर्थकों पर 2021 की रिपोर्ट कहती है, ‘दुर्भाग्य से अमेरिकी सरकार ने खालिस्तानी कार्यकर्ताओं द्वारा की गई हिंसा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, भले ही खालिस्तान अभियान के सबसे कट्टर समर्थक पश्चिमी देशों में मौजूद हों।’ अमेरिका में सक्रिय चरमपंथी समूहों और उनकी गतिविधियों को हवा देने में पाकिस्तान की भूमिका का रिपोर्ट में विस्तृत वर्णन है। अगर सुरक्षा एजेंसियां समस्या को आगे बढ़कर नहीं रोकतीं, तो 1980 का भयावह दौर लौट सकता है, जबकि खालिस्तानियों ने हमले किए और कनाडा की राजनीति को नियंत्रित करना शुरू कर दिया। यही नहीं, अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था में अपना पैसा भी लगाया। प्रवासी भारतीयों के बीच खालिस्तान आंदोलन मुख्य रूप से भारत से पहुंचा। इसका विचार प्रस्तुत किया जगजीत सिंह चौहान ने, जब वह 1960 के दशक की शुरुआत में ब्रिटेन पहुंचा। वजह यह थी कि वह पंजाब के विधानसभा चुनाव में हार गया था। याद दिलाने की ज़रूरत पड़े कि 23 जून 1985 को टोरंटो से उड़ान भरने वाली एयर इंडिया की फ्लाइट 182 ‘कनिष्क’ को खालिस्तानियों ने बम से उड़ा दिया था। इस हमले में विमान में सवार सभी 329 लोग मारे गए थे। कनाडा की ख़राब जांच के बारे में जितना कम बोला जाए उतना बेहतर। कनाडा की राजनीति खालिस्तानियों के साथ इतना घुलमिल गई है कि वहां के प्रधानमंत्री भी इस बारे में बात करने की हिम्मत नहीं करते। उल्टे जस्टिन ट्रूडो ने अपने पिछले भारत दौरे पर एक खालिस्तानी को रिसेप्शन में बुलाया था। जगमीत सिंह जैसे कनाडा के युवा राजनेता सिख आतंकियों की निंदा नहीं करते, क्योंकि उनसे वोट और पैसा आता है। वे भावहीन चेहरे के साथ कह सकते हैं, ‘मुझे नहीं पता कि एयर इंडिया बम हमले के लिए कौन जिम्मेदार है।’ कुछ लोगों ने बोलने की हिम्मत की, जैसे कि 1980 के दशक में लिबरल पार्टी के सांसद उज्जवल दोसांझ ने। उन पर क्रूरता से हमला किया गया, धमकियां मिलीं। एक कनाडाई सिख पत्रकार तारा सिंह हायर की गोली मार कर हत्या कर दी गई, क्योंकि उन्होंने एयर इंडिया बमबारी के ख़िलाफ़ लिखा था। हालांकि उन्होंने भी वजह का समर्थन किया था। बहुत लंबे अर्से से पश्चिम में सुरक्षित बैठे अलगाववादी देश के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं और उन्हें कोई परिणाम नहीं भुगतना पड़ रहा। इसी का नतीजा है कि खालिस्तान के समर्थन में आवाज़ें तेज़ हो गई हैं और चरमपंथी खुलेआम गुरुद्वारों पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं। पश्चिम के शहरों में हाल में जो विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए, उसके पीछे वजह है भारत में अमृतपाल सिंह की गिरफ्तारी का प्रयास। खालिस्तान समर्थक अमृतपाल ख़ुद को जरनैल सिंह भिंडरावाले की तरह दिखाने की कोशिश करता है। एक साल पहले तक वह दुबई में अपने परिवार का ट्रांसपोर्टेशन का बिजनेस संभाल रहा था। पंजाब में उसकी असलियत और उसके तरीकों पर सवाल उठाने वाले कई लोग हैं। विदेशों में भी कई सिख सवाल कर रहे हैं। लेकिन, खालिस्तान समर्थकों की आवाज़ सब पर भारी पड़ जाती है। हां इतना ज़रूर है कि प्रवासी राजनीतिक जटिल होती है, लेकिन हालात को समझते हुए कार्रवाई की ज़रूरत है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने पिछले तीन दशकों में कश्मीर और खालिस्तान समस्या को बदतर बना दिया है। लेकिन, जैसा कि हडसन इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट कहती है कि चूंकि खालिस्तान अभियान को अमेरिकी अपने देश की सुरक्षा और हित के लिए सीधे ख़तरा नहीं मानते, इसलिए सीधी कार्रवाई के बहुत कम प्रयास किए गए हैं।



