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कविता

मैं जिसे समझता अपना,

वो  समझे  मुझे पराये।।

बेइमानों की बस्ती में,

कैसे कोई  जी  पाये।।

 

पैसे के  खातिर  इंशा,

ईमान धर्म  खोता है।

अंत समय तक पापों,

की गठरी ले ढोता है।।

 

यह कैसा खेल अनोखा,

कैसी है जग की रीति ।

कैसे कोई कर पायेगा,

ऐसे  लोगों से प्रीति।।

 

ईश्वर हीं बेहतर जाने,

ऐसे लोगों की नीयत।

जो हरदम हीं करते हैं,

संग रहके बडी़ फजीहत।।

 

रसिया इनकी मनमानी,

कुछ दिन तक हीं चलती है।

कलुषित इनके चेहरे पर,

ना खुशी कभी मिलती है।।

 

गीतकार: रसियाकुमार

मो* 9892850937

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