मुंबई (सं. भा.) भारतीय सनातन परंपरा में पुत्रों द्वारा माता-पिता के अंतिम संस्कार करने की परंपरा रही है. इसी लिए हर मां बाप वंश चलाने के साथ अंतिम संस्कार के लिए पुत्रों की कामना करते हैं. लेकिन इस प्राचीन परंपरा को दरकिनार करते हुए तीन पुत्रियों ने अपनी माता के अर्थी को कंधा देते हुए श्मशान भूमि में सभी अंतिम कर्मकांड को पुत्रवत संपादित किया. जैन समाज की श्राविका आशा देवी बापना (48) का कल शनिवार को मालाड में आकस्मिक निधन हो गया. ज्ञानचंद बापना को सिर्फ 3 पुत्रियां है. कोई बेटा नही होने से जब उनके निवास से अंतिम यात्रा प्रारंभ हुई तो तीनों बेटियों, पूजा, प्रेक्षा तथा प्रज्ञा ने मां की अर्थी को कंधा देते हुए पुत्र धर्म का निर्वहन किया.
राजस्थान के जिलोला निवासी मालाड के प्रवासी ज्ञान चंद बापना कि धर्मपत्नी आशा देवी मालाड तेरापंथ महिला मंडल के अध्यक्ष पद पर काम कर चुकी थीं. ज्ञान चंद बापना ने भी तेयुप मालाड के अध्यक्ष के साथ सभा के विभिन्न पदो पर काम कर चुके है. धार्मिक परिवेश में आशा देवी ने कई बार आठाई उपवास और पखवाड़े की तपस्या की थी.
जैन साधु साध्वियों की विहार सेवा में आगे रहने वाली आशादेवी के निधन पर बड़ी संख्या में तेरापंथ जैन समाज उनकी अंतिम यात्रा में जमा हुआ. मोक्षधाम में अपनी मां की चिता को अंतिम विदाई देते हुए तीनों बेटियों ने मुखाग्नि दी. इसे देख कर जहां कई लोग गर्वित महसूस कर रहे थे तो कई की आंखे छलक पड़ी. यही नहीं अपनी मां के निधन पर तीनों बेटियों ने संकट की इस घड़ी में अपने पिता और दादा रोशन लाल, दादी संपत बाई को समझाते हुए सांत्वना दी.


