तुम सावन की मस्त घटा हो,
मैं बादल आंवारा हूँ।
चाहने वाले बहुत तुम्हें,पर
मैं सबसे हीं न्यारा हूँ।।
आँखों से ओझल होती हो,
तब भी दिल में रहती हो।
कानों में मीठी वाणी से,
कुछ तो मुझसे कहती हो।।
जन्मो से तुमसे रिश्ता है,
ऐसा अक्सर लगता है।
बाहों में पाने को जानम,
ये दिल मेरा मचलता है।।
मानो या फिर ना मानो तुम,
तनहा जब भी होता हूँ।
खुद से बीती यादें कहके,
सिसक सिसक के रोता हूँ।।
दर्द मेरा कोई क्या समझे,
इक टूटा सा तारा हूँ।
क्या जाने कब मिट जाउंगा,
युँ समझो गुब्बारा हूँ।।
गीतकार: रसियाकुमार


