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ग़ज़ल

इश्तिहार में!

लोग  गवां  देते  हैं अपना  वक़्त  बेकार में,

बेमतलब का कुछ छाए रहते हैं अख़बार में।

छुपाये  से  कहाँ   छुपते  हैं  दागदार  चेहरे,

ईमान  बेचकर  सौदा करते खुले बाज़ार में।

पहले तो लूटते थे भू – माफिया बनकर  वो,

अब  रास्ता  बदलकर  जाते हैं  सरकार में।

मध्यम वर्ग परेशान है पाश्चात्य  संस्कृति से,

उसका एक पांव किनारे, दूसरा मझधार में।

सच की  मंडी  में बहुत  है  आजकल  मंदी,

सचवाले  बहुत  ही कम  चलते हैं  कार में।

दादा – दादी  की कहानी जब से हुई पुरानी,

नहीं पलते -बढ़ते अब के बच्चे  संस्कार में।

लोक -लज्जा  की उसको कहाँ इतनी पड़ी,

बेच डाली लाज कुछ पैसे के इश्तिहार  में।

                   रामकेश एम. यादव

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