केंद्र में सत्तासीन और देश की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी मुश्किल में है। उसके कार्यकर्ताओं में अब वो उत्साह और चमक नहीं जो पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले थी। इतनी मेहनत के बाद भी पश्चिम बंगाल विधानसभा भाजपा के हाथ नहीं आई, इस बात का पार्टी के बड़े नेताओं सहित कार्यकर्ताओं को भी मलाल है। बात ज़्यादा दिन की नहीं है। अभी कुछ महीने पहले तक भारतीय जनता पार्टी का चटक रंग चहु ओर बिखर रहा था। कमल हर जगह खिल रहा था। जब पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव करीब थे, तो विपक्षी पार्टियों से नेता इतने आकर्षित हो रहे थे कि वो भाजपा में चले आ रहे थे। केरल में तो भाजपा का दामन मेट्रो मैन ई श्रीधरन ने भी थाम लिया। केंद्र शासित पुडुचेरी में बीजेपी गठबंधन को सत्ता तो मिल गई। भाजपा की तूती ऐसी बोल रही थी कि कार्यकर्ता तक जोश में थे। फरवरी के तीसरे हफ्ते में पार्टी ने जब अपने पदाधिकारियों की पहली बैठक बुलाई थी, तो उसमें दावा किया गया कि पीएम मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ने ना केवल कोविड को हराया, बल्कि अपने सभी नागरिकों में ‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाने का विश्वास भी जगाया’ है। मगर ये क्या? ये विश्वास तो कोविड की दूसरी लहर में ही टूट गया। देश की सबसे बड़ी पार्टी के लिए हालात कुछ ठीक नहीं। उत्तर प्रदेश से लेकर लक्षद्वीप तक, उसके अपने ही नेताओं में असंतोष है। विभिन्न मोर्चों पर पार्टी कई चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे हालात क्यों पनपे? क्यों ये बगावती सुर तेज़ हो रहे हैं, और क्या करवट लेगी राजनीति? ये सवाल देश की इस सबसे बड़ी पार्टी के लिए चुनौती बने हुए हैं। पार्टी के बड़े नेता इन सवालों के निपटारे में लगे हैं। पार्टी के बड़े नेताओं को पता है कि पार्टी के अंदरूनी असंतोष के लिए कौन जिम्मेदारी है। मगर वे चुप हैं। आखिर कर भी क्या सकते है। देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी में असंतोष के सुर का उभरना कोई नई बात नहीं है। ऐसा पहले भी होता आया है। खासकर सत्तारूढ़ पार्टी के लिए ये सब आम बात है। जो सत्ता में होगा, उसकी जिम्मेदारियां अधिक होंगी और उससे लोगों की अपेक्षाएं भी ज्यादा होंगी। अब ऐसे हालात में असंतोष पैदा होना लाजिमी है। प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी का परफारमेंस अच्छा कहा जा सकता है। कई मोर्चों पर वे देश के अन्य प्रधानमंत्रियों से बीस ही रहे हैं। उनमें नेतृत्व क्षमता के साथ सही फैसला लेने की कूबत है। वे एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें देश की जनता का मिजाज पता है। वे जनता को समझते हैं, उनकी परेशानियों को जानते हैं और उसे हल करने का पूरा प्रयास करते हैं। वे समझते हैं कि देश के लोगों की उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं, अपेक्षाएं हैं। जिसे उन्हें पूरा करना है। वे चाहते भी हैं कि देश में खुशहाली हो, लोग संपन्न हों, किसी को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो। मगर हमारा भारत देश ही ऐसा है, जहां सभी को संतुष्ट कर पाना एक टेढ़ी खीर है। जब रामराज्य में भी जनता अपने राजा से खुश नहीं थी, उस समय भी लोगों में अपने राजा के प्रति असंतोष था, तो यह तो कलियुग है। हमारा देश विविधताओं वाला देश हैं। यहां की इतनी बड़ी आबादी यूरोप और अमेरिका की कुल आबादी से भी अधिक है। ऐेसे में देश के प्रत्येक व्यक्ति को अथवा पार्टी के प्रत्येक कार्यकर्ता या पदाधिकारी को संतुष्ट कर पाना किसी भी प्रधानमंत्री या पार्टी के लिए संभव नहीं। प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की चमक अब भी बरकरार है। लेकिन आज जो परिस्थितियां पार्टी के अंदर और पार्टी के बाहर उत्पन्न हुई है, उसमें वे अपनी पार्टी की नैया कैसे पार लगा पाते हैं, यह तो समय ही बताएगा।


