भारत देश जहां रिश्ते ईश्वर की देन और किस्मत से मिलने की बात कही जाती है। वहां एक रिश्ता ऐसा भी है जिसे अपनों की मर्जी और रस्मों से बनता है। भारतीय समाज में पति-पत्नी के बने रिश्ते आज के समय में हजारों चुंबन में निभाएं जातें हैं। देश में अक्सर आपको देखने को मिल जाएगा कि एक शादीशुदा स्त्री के साथ कितना अपमान किया जाता है। उसका अपना परिवार कहें जाने वाले परिवार में, अक्सर उसे बताया जाएगा कि इस घर की नहीं है और इस घर में वह सब नहीं कर सकतीं हैं जो अभी तक अपने घर में करतीं आई है। हमारे यहां हम एक लड़की जो अपना घर छोड़कर आई है उससे उम्मीद रखते हैं कि वह हमारे हिसाब से चलें।
हमारे देश में स्त्रियों को देवी का रूप मानकर पूजा जाता है। किन्तु जब वही स्त्री घर में बहू और पत्नी रूप में आतीं हैं। तब उन्हें इस तरह का व्यवहार देखने को मिलता है जिसकी उन्होंने उम्मीद नहीं की होती है। हमारे देश में प्रेम विवाह भी एक आम बात हो गई है। इसके बावजूद भी स्त्रियों की स्थिति में कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है। अधिकतर महिलाएं होती हैं जिन्हें शादी के बाद अपना परिवार कहें जाने वाले परिवार में अपमान का सामना करना पड़ता है।
हमारे देश में जहां आज स्त्रियां एक ओर पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कर कामयाबी के झंडे गाड़ रहें हैं। उसके बाद भी जब स्त्री पुरुष की जीवन संगिनी बनतीं है। तब वहीं पुरुष उसको यह बताना शुरू कर देता है कि स्त्री होना क्या होता है। उसको हर क़दम पर उसकी जिम्मेदारी याद दिलाई जाती है। उसे बताया जाता है कि बहू होना और बहु होने की जिम्मेदारी क्या होती हैं। पुरूषों ने चाहें कभी स्वयं बेटे और भाई होने का रिश्ता ना निभाया हो, लेकिन अपनी पत्नी को हर रिश्ता निभाना जरूर सिखातें है।
एक पुरुष प्रधान समाज में रहने के कारण हमारे देश में हमेशा से स्त्रियों ने बहुत सी समस्याओं का सामना किया और अभी भी कह रहीं हैं। जब ईश्वर के बनाएं रिश्ते को निभाने की बात आती है। तब भी पुरुष प्रधानता की बात होती है। महिलाओं को घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी निभाना सिखाया जाता है। 21वीं सदी में भी महिलाओं को बताया जाता है कि पुरुष का नाम लेकर नहीं बुलाना है। सबके खाना खाने पर ही खाना खाने की सलाह दी जाती है।
आज जब स्त्रियां अपने पैरो पर खड़ी हो गई है और स्वयंम की आर्थिक कमाई पर जीवन यापन कर सकने के काबिल हुई है। तब भी यही सोचा जाता है कि वह शादी के बाद अपने पति और ससुराल वालों पर अपनी कमायी खर्च करें और यदि कभी वह अपने माता-पिता या भाई-बहन की मदद के बारे में सोच लें तो उनको इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। अक्सर यह भी देखा जाता है कि महिलाओं का कार्य स्थान उनके घरों से दूर होता है, जबकि पुरुषों का कार्य स्थल घरों के आसपास होता है। जिसके चलते महिलाओं को ओर अधिक समस्या का सामना करना पड़ता है।
शादी के बाद स्त्रियां जिस प्रकार की समस्याओं से जूझती हैं। उनका कारण केवल पुरुष ही नहीं स्त्रियां स्वयं भी होती है। वह स्वयं यह दिखाने का प्रयास करतीं हैं। कि हम सब कर सकते हैं, जिसके चलते समस्या उत्पन्न होती है। हमें यह समझना होगा कि स्त्रियां भी इंसान होती है और केवल पुरुष प्रधान समाज में रहने की कीमत चुकाने के लिए वह जीवन को सुली पर नहीं चढ़ा सकतीं हैं। हमें समझना होगा कि हम उन्हें भी बराबरी का अधिकार दें। अपना घर छोड़कर आना स्त्री की कमजोरी ना समझे। पुरूष प्रधान समाज ने यह रीत बनाई है इसलिए वह निभा रही हैं। किन्तु यदि जिस दिन उसने यह रीत निभानी छोड़ दी, कभी सोचा क्या होगा पुरुष प्रधान समाज का। स्त्रियों को हमें इज्ज़त और सम्मान देना चाहिए क्योंकि यह हमारा सौभाग्य है कि वह इस समाज में हैं।
…राखी सरोज


