द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक त्र्यंबकेश्वर मंदिर में कुछ मुस्लिम युवकों ने लोबान जलाने का प्रयास किया और सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक दिया। महाराष्ट्र सरकार ने घटना की जांच एसआईटी को दी है। ऊपर से सियासत भी गरम हो गई है इस मुद्दे पर। कहा जा रहा है कि युवक अंदर नहीं जा रहे थे। मंदिर की पहली सीढ़ी से ही त्र्यंबकेश्वर महादेव को लोबान की धूप देने आए थे बस और यह परंपरा बहुत पुरानी है। त्र्यंबकेश्वर उन मंदिरों में है, जहां गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। ऐसे में यह रिवाज कैसे आ गया? इस जगह औरंगज़ेब और मराठों के बीच जंग भी हुई थी। मुग़ल फ़ौजों ने मंदिर को तहस-नहस कर दिया था। कहते हैं कि तब एक मस्जिद भी बनवाई गई थी मंदिर परिसर में, जो अब नहीं है। आज के विवाद की जड़ें इसी इतिहास में तो नहीं? मंदिर के उत्तरी द्वार की मुख्य सड़क पर आगे कुछ ही दूरी पर सूफी फकीर हज़रत सैयद गुलाब शाह वली की दरगाह है। वहां उर्स लगता है हर साल। संदल बाजे-गाजे के साथ मंदिर के आगे से गुजरता है। मंदिर के द्वार पर पहुंचते ही संदल के लोग मुख्य मंदिर की पहली सीढ़ी से ही लोबान की धूप देते हैं। लेकिन, वे गर्भगृह में कभी नहीं जाते। इस्लाम का सूफी पंथ हिंदू-मुस्लिम एकता का हिमायती रहा है। उर्स के आयोजकों में से एक सलीम सैयद का दावा है कि कोई सौ साल से यह परंपरा है। कम से कम उनके दादा और अब्बू को इसी रिवाज का पालन करते हुए उन्होंने देखा। पिछले साल का ऐसा ही एक विडियो उनके पास है। इसके पूर्व केवल मौखिक सबूत हैं। हिंदू संगठनों और मंदिर प्रबंधन ने ऐसे किसी रिवाज से इनकार किया है। किसी समय हो सकता है कि गैर-हिंदू रियायती तौर पर मुख्य द्वार से अंदर आ भी गए होंगे, तो इसे रिवाज कहना ग़लत है। जब मंदिर में गैर-हिंदुओं का प्रवेश निषिद्ध है, तब उनके धूप दिखाने का रिवाज बन ही कैसे सकता है? गैर-हिंदुओं का प्रवेश केवल त्र्यबकेश्वर ही नहीं, देश के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों में भी निषिद्ध है। इनमें जगन्नाथ, काशी विश्वनाथ, पद्मनाभस्वामी, गुरुवायुर, मीनाक्षी, दिलवारा मंदिर और यहां तक कि काठमांडु का पशुपतिनाथ मंदिर भी शामिल है। हिंदू संस्कृति की विविधता देखें कि केरल के चेंगलूर भगवती मंदिर, आंध्र के कामरूप कामाख्या मंदिर, कुमारी अम्मा मंदिर में गर्भगृह में विग्रह के सामने पुरुषों का प्रवेश निषिद्ध है। शिरडी के पास शनि मंदिर के चबूतरे पर तो अब तक महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध माना जाता था। इन रिवाजों का इस घटना के सिलसिले में याद आना सहज है। असल में मूल मुद्दा है प्रसिद्ध मंदिर और मस्जिदें या मज़ारें आसपास होना। मुग़ल काल से ये ‘स्पार्किंग पाइंट’ रहे हैं। लेकिन, त्र्यंबकेश्वर में ऐसी कोई बात नहीं हुई। केवल मामूली अनबन पर बात ख़त्म हुई लगती है। मना करने पर युवक लौट गए। पुलिस में मामला गया। सैयद समेद चार युवकों को थाने लाया गया। महाराष्ट्र सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की है। लेकिन, इसके पूर्व ही इन युवकों ने कहा कि, ‘यदि लोबान के रिवाज के कारण किसी की भावना को थोड़ी भी ठेस पहुंची हो, तो हम दिल से माफी मांगते हैं। यदि हिंदू भाइयों को पसंद ना हो, तो यह रिवाज हम अगले वर्ष से पूरी तरह बंद कर देंगे। हम कस्बे में साथ-साथ खेले हैं, झगड़ा-फसाद नहीं चाहते।’ फिर भी, हिंदू संगठनों ने गंगा-गोदावरी आदि पंचनद के जल, फूल, गोमूत्र से मंदिर को शुद्ध किया है। लेकिन, परदे के पीछे किसने गांठें डाली हैं, क्या कोई साजिश है, क्यों राजनीतिक रंग दिया जा रहा, यह जांच का विषय है। यह जांच इसलिए बनती है, क्योंकि अकोला, नासिक और अहमदनगर ज़िले के शेवगांव में पिछले हफ्ते ऐसी ही चिंगारी भड़की थी। इस चिंगारी के बीज इतिहास में मिलते हैं। औरंगज़ेब के काल में दोनों समुदायों में त्र्यंबकेश्वर में भिड़ंत हुई। मुग़ल फ़ौजों ने 1690 में इस मंदिर को तहस-नहस किया था। प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार की किताब ‘हिस्ट्री ऑफ औरंगज़ेब’ में इस घटना का ज़िक्र है। इसके आगे की कहानी एक अन्य प्रसिद्ध इतिहासकार गोविंद सखाराम सरदेसाई की ‘न्यू हिस्ट्री ऑफ मराठा’ के खंड दो में मिलती है।सरदेसाई का कहना है कि मंदिर परिसर में तब मस्जिद भी बनाई गई थी। वह तो अब नहीं है, लेकिन उसके कुछ आगे हज़रत गुलाब शाह वली की दरगाह आज भी मौजूद है। यह प्रसिद्ध सूफी फकीर हैं, जो दोनों समुदायों में भाईचारे के प्रतीक हैं। उनका जन्म 1858 का बताया जाता है। इसका अर्थ यह कि या तो यह दरगाह उसके बाद बनी होगी या फिर किसी पुरानी इमारत में तब्दीली कर उसे दरगाह बना दिया गया होगा। यह ऐतिहासिक जांच का विषय है। हालांकि महंत अनिकेत शास्त्री का दावा है कि यह पहले नाथ सम्प्रदाय का मंदिर था, जिसे मस्जिद या दरगाह में तब्दील किया गया। नाथ सम्प्रदाय गोरक्षनाथ से जुड़ा सम्प्रदाय है। संत ज्ञानेश्वर के बड़े भाई और गुरु निवृत्तिनाथ इसी सम्प्रदाय के हैं। वह त्र्यंबकेश्वर में ही रहे, उनकी समाधि आज भी वहां है। उनकी आज्ञा से ही ज्ञानेश्वर ने ‘ज्ञानेश्वरी’ लिखी। वह तेरहवीं सदी के संत हैं।



