अभी ताजा-ताजा कर्नाटक में विधान सभा और उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव खत्म हुए है। कर्नाटक में इसका नतीजा भी काॅग्रेस के पक्ष में आ चुका है और उत्तर प्रदेश में भाजपा अपना परचम फहराने में कामयाब हुई है। कर्नाटक अब यह कॉग्रेस आला कमान की जिम्मेदारी है कि उसे मुख्यमंत्री किसे बनाना है और भाजपा निकाय चुनावों में महापौर की गद्दी पर किसे बैठाये! मुझे इस बात से कोई सरोकार भी नही है। मुझे इस बात से भी मतलब नही है कि किस दल को कितनी सीट मिली और कौन कहां से जीता या हार! यह मेरा सीर दर्द नही है।
मुझे लगता है,लोकतंत्र में भाजपा के घोडे को बेलगाम दौड़ने से रोकने के लिए 2-4 चुनाव हारना जरूरी भी है। यह बात बिल्कुल सही भी है कि अधिकांश राज्यों में भाजपा शासित सरकारें है लेकिन कुछ राज्यों में ही सही विपक्ष की सरकारों का मौजूद रहना लोकतंत्र और भाजपा की सेहत के लिए अच्छा है।
लगातार जीत से संभव है,भाजपा अतिरिक्त आत्मविश्वास का शिकार हो अतिवादी हो जाये। हर राज्य में अगर भाजपा का शासन होगा तो भाजपा ओवर काॅन्फीडेंस का शिकार हो सकती है। ऐसे में उसके बेलगाम होने की आशंका अधिक बढ सकती है और ऐसा होना लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बन सकता है।
भाजपा ही नही किसी भी राजनीतिक दल का लगातार जीतना लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकता है। इसलिए 2-4 हार बहुत जरूरी है। मैं मानता हूँ कि अन्य दलों के मुकाबले भाजपा बेहतर शासन व्यवस्था कायम करती है लेकिन विपक्षी शासन इस बात को तुलनात्मक अध्ययन प्रदान करता है कि कौन बेहतर है! आम जनमानस तुलना करके अपना निर्णय देता है और अपने विचार विकसित करता है। वैसे उत्तर प्रदेश चुनाव में एक अजीब बात हुई है,जिस अयोध्या को भाजपा ने विकास की सौगात दी है,जो अयोध्या भाजपा का चुनावी ब्रह्मास्त्र है,उसी अयोध्या में भाजपा को निकाय चुनाव में 60 सीट में से सिर्फ 27 सीट पर विजय हाथ लगी है। भाजपा आधी सीट पर भी विजय हासिल नही कर पायी,जबकि कम से कम यहां तो भाजपा को एक तरफा क्लीन स्वीप करते हुए जीत हासिल करना चाहिए था। राजनिती के समीकरण कई दफा समझ से परे हो जाते है। असमंजस की स्थिती पैदा कर देते है।
मैं यहा चमचों,अंधविरोधियों और अंधभक्तों की बात नही कर रहा हूँ,ये विचारे तो कायनात को भी पछताने पर मजबूर कर देते है। ये सर्वथा अलग,गलत और अजीब प्राणी है। कुछ बिमारियों की तरह कुछ लोग भी लाइलाज होते है,ये उसी श्रेणी में आते है। भाजपा की हार ईवीएम मशीन के लिए भी अच्छी होती है,बेचारी की इज्जत बच जाती है,वर्ना भाजपा की जीत पर तो इसकी बहुत फजीहत होती है और भारत की भाजपा विरोधी जनता भी कितनी मासूम होती है कि वो इस बात पर विश्वास भी कर लेती है। भले चुनाव आयोग कितनी भी सफाई दे या सुप्रीम कोर्ट फैसला दे लेकिन इनके लिए तो भाजपा विरोधी दलों की बात ही पत्थर की लकीर है। जो इन्होने कह दिया,वो अंतिम सत्य है। ऐसा लगता है,जैसे ये समूह अपना दिमाग घर पर फ्रीज में छोड आता है। हमे यह बात समझनी चाहिए कि यह भाजपा विरोध नही, भाजपा खासकर नरेद्र मोदी से नफरत है। भाजपा इस बात को जितना जल्दी समझ लें,भाजपा के लिए “सब का विश्वास ” मंत्र पर मंथन करना उतना ही आसान हो जायेगा। भाजपा को यह समझना चाहिए कि यह वह समूह है जिसके लिए भाजपा अपनी जान भी दे दे तब भी यह समूह कभी संतुष्ट नही होगा। इसलिए भाजपा को “सब का साथ,सब का विकास ” मंत्र पर ही ध्यान देना चाहिए, ” सब का विश्वास ” जीतने पर समय नष्ट नही करना चाहिए।
मुझे एक बात का बडा मजा आता है, जैसे ही भाजपा किसी राज्य में चुनाव हारती है,अफवाह तंत्र तुरंत सक्रीय हो जाता है। लोगों के हुजूम में “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे सुनाई देने लगते है और सोशल मिडिया पर ऐसी विडियों छाने लगती है लेकिन शायद ही कोई इस बात की पड़ताल करता है कि ऐसी अधिकांश विडियों डब करके प्रसारित कराई जाती है। भाजपा की हार के बाद सोशल मिडिया पर एक समुदाय विशेष पर हमले तेज हो जाते है।
जैसे ही भाजपा चुनाव हारती है, चमचों और अंधविरोधियों के रूप में कुछ देश द्रोही तबका हावी हो जाता है। इन्हे समझ ही नही आता मुल्क अलग चीज है और मोदी अलग लेकिन नरेद्र मोदी के बहाने ये भारत का विरोध करने लगते है। क्या इन्हे इतनी भी समझ नही कि मोदी और मुल्क अलग-अलग है या भाजपा की हार के बहाने ये अपनी दबी कुंठा और चाहत बाहर उजागर करते है ? मोदी समर्थन को एक तरह से इस विरोधी समूह ने देश भक्ती की पहचान बना दी है। यह भारत और भाजपा के लिए अच्छा भी है।
चुनाव के दौरान एक बात और मजेदार होती है। भाजपा को हराने वालों को सोशल मिडिया पर सीधे-सीधे गद्दार घोषित कर दिया जाता है। जैसे भाजपा एक राजनितीक दल न होकर देशभक्ती का प्रतिक और प्रतिनिधी हो और मोदी इसकी पहचान हो! भाजपा समर्थकों का हिदुत्व के नाम पर ऐसा लगातार करना आम नागरिकों में एक वक्त के बाद चीढ पैदा करेगा और भविष्य में भाजपा के साथ आने वाला मतदाता भी उस से दूर हो जायेगा।
भाजपा के सभी चुनाव मोदी के इर्द-गिर्द ही लडे जाता है। एक ही कंधा आखिर कितना बोझ उठायेगा? ऐसा लगातार करने से मतदाता बेरस महसूस करता है,बोर होता है,एक वक्त के बाद भाजपा से उसके छिटकने की संभावना बढ जाती है। भाजपा को स्थानीय स्तर पर कुछ कर्मठ, कद्दावर नेतृत्व विकसीत करना होगा। नरेद्र मोदी कोई भगवान तो है नही जो एक ही समय हर जगह उपलब्ध रहेगे, उन्हे केद्र संभालने दिजिए और योगी आदित्य नाथ, देवेन्द्र फणडवनीस,हेमंत सिरोन और विप्लव देव जैसे बेहतरीन स्थानीय नेतृत्व को राज्यों में विकसित किजिए। ये कब तक मोदी-शाह के नाम से रोटी खाते रहेंगे? जितने जल्दी हो भाजपा को इस दिशा में सोचना शुरू कर देना चाहिए,वर्ना अगले पचास साल तक भारत की सत्ता पर काबिज रहने का ख्वाब सिर्फ मुंगेरीलाल के हसीन सपने ना साबित हो!
वैसे भाजपा की हार चमचों और अंधविरोधी समूह में एक नई उर्जा का संचार करती है। मरणासन्न शरीर में ऑक्सीजन का काम करती है और फिर ये सोशल मिडिया पर नंगा नाचने लगते है। चुनावी हार कैसी भी हो,नरेद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले शुरू हो जाते है। एक समुदाय विशेष तो व्यक्तिगत हमलों में बढ-चढ कर हिस्सा लेने लगता है। मोदि अंधविरोधियों का यह समूह कुछ ज्यादा ही कुंठीत है,कुछ अधिक ही नफरती है,कुछ अधिक ही नंगा है। नंगा हो कर नाचने वाला शख्स अपनी खूशी नही, अपना गिरा हुआ स्तर दिखाता है। अपने छोटे और निम्न स्तर की पहचान कराता है।
डाॅ धीरज फूलमती सिंह (वरिष्ठ स्तंभकार)


