मुंबई (सं. भा.)। कहते है कि शिक्षा वह ज्ञानरुपी दीपक है जो अज्ञानरुपी अंधेरे को नष्ट कर देता है। शिक्षा के इस महत्व को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट आदेश दिया है कि प्रदेश का कोई भी छात्र शिक्षा से वंचित नही रहना चाहिए। इसके लिए प्रशासन को सभी आवश्यक कदम उठाने चाहिए। कई स्कूलों द्वारा फीस न भरने वाले विद्यार्थियों को शिक्षा से वंचित रखने की बात पर हाई कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को यह आदेश दिया कि जिन विद्यार्थियों के अभिभावक फीस नहीं भर पा रहे है उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जाए। इसके बावजूद किसी विद्यार्थी को शिक्षा से वंचित रखा गया और हमारे पास इसकी शीकायत आई तो उस स्कूल पर कार्रवाई करने का आदेश राज्य सरकार को दिया है।
फीस न भरने वाले विद्यार्थियों का मामला
कोरोना के बाद लॉकडाउन के कारण कई अभिभावकों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में राज्य सरकार ने सभी स्कूलों को एक साथ के बजाए किस्तों में फीस लेने का आदेश ८ मई को जारी किया था। सरकार के इस आदेश के खिलाफ एसोसिएशन ऑफ इंडिया स्कूल, ग्लोबल एजुकेशन फाउंडेशन, ज्ञानेश्वर माऊली संस्था और नवी मुंबई के कासेगाव एज्युकेशन ट्रस्ट ने हाई कोर्ट में याचिका दाखल की गई। इस याचिका पर मुख्य न्या, दीपांकर दत्ता और न्या, गिरीश कुलकर्णी की खंडपीठ ने गुरुवारी को सुनवाई की। फीस न भरने वाले विद्यार्थियों को ऑनलाइन लिंक न देना, अभिभावकों से फीस के लिए लगादा करना और लिविंग सर्टिफिकेट देने से कन्नी काटने की बात राज्य सरकार के वरिष्ठ वकील अनिल अतुरकर और एड भूपेश सामंत ने कोर्ट के समक्ष रखी।
अबतक ९७ प्रतिशत अभिभावकों ने फीस भर दी है मात्र ३ प्रतिशत अभिभावक फीस भरने को लेकर कन्नी काटने की बात याचिकाकर्ता के वकी; ने कही। इसके बाद राज्य सरकार के वकी; ने कोर्ट के समक्ष सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को प्रस्तुत किया जिसमें फीस न भरने वाले विद्यार्थियों को शिक्षा से वंचित न रखने का फैसला सुनाया है। उक्त फैसले को न्यायाधीश ने संज्ञान में लिया लेकिन समय के अभाव के कारण इसपर अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी।


