वरिष्ठ टीवी पत्रकार संजय सिंह ‘निर्जल’ का पहला उपन्यास घुन्ना एकदम प्रोफेशनल तरीके से लिखा गया है।
यह उन किरदारों की कहानी है, जो अपनी नाराज़गी और शिकवे को मन में छिपाए रखते हैं, लेकिन सही मौके पर घात करने से नहीं चूकते। यहाँ हर रिश्ता आर्थिक, सामाजिक और पारंपरिक तानों-बानों में उलझा है। हर व्यक्ति अपने भीतर घुन्ना पालकर दूसरों के ख़िलाफ़ अपनी चाल चलने की ताक में रहता है। यह उपन्यास मानव स्वभाव की गहराइयों और रिश्तों की जटिलता को बयां करता है।
निर्जल ने घुन्ना में बड़े दिलचस्प किरदार सृजित किए हैं तो इसकी मूल वजह है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद वे टी.वी. पत्रकारिता में रम गए। उन्होंने अपने अठारह साल के टी.वी. पत्रकारिता के दौरान देश के कई प्रमुख चैनलों में काम किया। साथ ही इस दौरान डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाते रहे। 2018 के बाद किताब लेखन की तरफ़ रूख किया। स्टोरीटेल के लिए सूर्या नामक सीरीज लिखी। स्टोरीटेल के लिए क्राइम स्टोरी मैक और तीन कंकाल का भी लेखन कार्य किया।
ज़ीटीवी पर प्रसारित होने वाले सीरियल रामभक्त तुलसीदास की संकल्पना और शोध निर्जल ने ही किया है। वर्तमान में सीरियल रामभक्त तुलसीदास की कहानी लेखन में सक्रिय हैं। इसलिए घुन्ना पढ़ते हुए लगता है कि हम कोई तेज रफ्तार सामाजिक फ़िल्म देख रहे हैं।
हाइवे के किनारे नए नए बने मंकी मॉल से घुन्ना की कहानी शुरू होती है जहां पीपल गांव का देवेंद्र पांडे उर्फ टीटू मोटर साइकिल से विंडो शॉपिंग के लिए आया है वापसी में पार्किंग में उसकी मुठभेड़ देहरा गांव के इंद्रजीत नारायण सिंह से होती है। बात बात में इंद्रजीत को अपनी बुलेट 30 हजार रुपए में देबू पेंटर को दे देनी पड़ती है। खिसियाया इंद्रजीत टीटू को ताना मारता है कि सात पीढ़ियों से तेरे बाप दादा एक पीपल का पेड़ लगा नहीं पाए और तुम्हारे घर की माँ बहनें चली आती हैं हमारे गांव पीपल पूजने, तू लगा पीपल अपने गांव में। बस यहीं से कहानी शुरू हो जाती है। और उसके सूत्र जुड़ते हैं ब्राह्मणों के पीपल गांव से।
“देहरा और पीपल गाँव के बीच बस यही एक मतभेद नहीं था, बल्कि उनके बीच कई विवाद थे, देहरा ठाकुरों का गाँव था, पीपल ब्राह्मणों का गाँव था, दोनों में ठनी रहती थी और उनके बीच सीमा रेखा भी थी, गाँव के बीच बहती तिलकिया नदी। नदी को लेकर भी विवाद था, लेकिन इस सबके बावजूद दोनों गाँव में आना-जाना मिलना-जुलना चलता रहता था। घोषित तौर पर पीपल गाँव के ब्राह्मण देहरा के पुरोहित थे और देहरा के ठाकुर पीपल गाँव के ब्राह्मणों के जजमान थे।”
टीटू के साथ उनके पिता गोभी पांडे, मां मालती, बहन अंजलि, टीटू का जिगरी दोस्त मंटू/ बांचू भी कहानी में गहरे तौर पर उपस्थित हैं। टीटू की बहन मामा डीडी उर्फ दुष्यंत दुबे के गांव के शेखर से इश्क करने लगती है-
“अंजलि को शेखर से इश्क हो गया था, ठीक वैसे ही जैसे सड़क पर चलते हुए दुर्घटना हो जाती है, बिन बताए, बस हो जाती है, होने के बाद पता चलता है कि हाथ टूटा कि पैर टूटा, ना जाने क्या क्या टूटा-फूटा, या दुनिया से ही रिश्ता टूट गया। अच्छा-भला इंसान धरती पर चल रहा होता है, एक पल के हादसे के बाद धरती छोड़ यमराज के दरबार में पहुँच जाता है, अब उसका अगला ठिकाना यमराज भरोसे होता हैं, जहाँ पहले उसके कर्मों का हिसाब-किताब होता है, फिर उसके आधार पर तय होता है कि उसके साथ क्या किया जाए, उसे स्वर्ग में भेजा जाए या नरक भेजा जाए।”
निर्जल की लेखनी एकदम सधी हुई है। वे बड़ी खूबसूरती से दृश्यों को रचते हैं-
“पीपल और देहरा की सड़क का संगम हाईवे पर जहाँ होता था. अ त्रिवेणी पर एक छोटा-सा द्वीप बन गया था, वहाँ की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती थी, सामने से गुजरता लखनऊ वाराणसी हाईवे, अगल बगल से आत हुई गाँव की पतली बलखाती सड़कें, दोनों सड़कों के बीच से बहती हुई तिलकिया नदी और उसके साथ लगती हरियाली, इस छोटे से गाँव के प्रदेश द्वारा को हराभरा और खूबसूरत बना देती है, जिसे आते जाते हर कोई देखता था, सराहता था और गुजर जाता था, इस जगह का व्यावसायिक उपयोग भी किया जा सकता है, ऐसा विचार सबसे पहले बुडू साब के विभाग में आया, साव ने पेड़ों की लड़ी के बीच एक पेड़ का चुनाव किया और उसके नीचे गुमटी डाल दी।”
पीपल गांव के प्रधान गंगा सहाय, बुधई पांडे, गौरी चाचा इलाके के विधायक गोवर्धन शरण, विशंभर सेठ, नंदलाल गुप्ता आदि चरित्रों के जरिए निर्जल ने 1857 के गदर की चर्चा, भारतीय समाज की समकालीन विसंगतियां, आपसी रिश्तों में स्वार्थ, चुनाव में टिकटों का खेल, प्यार मोहब्बत की तरंग, महिला सशक्तिकरण, बच्चों की शादी की चिंता, जमीनी विवाद पुलिस पर राजनीति का दबाव, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की असलियत आदि को कहानी के सूत्र में पिरोया हैं। इसमें अंजलि और शेखर का इश्क है। उपन्यास में महिला सशक्तिकरण की प्रतीक सविता कुमारी का बेहतरीन तरीके से चरित्र चित्रण हुआ है। एक रोचक प्रसंग है कि टीटू जब बिना टिकट जेल चला जाता है तो उसके बाद हालात दिलचस्प रूप से बदलते हैं। जेल से वापसी में वह गांव फूलों से सजी गाड़ी में आता है। गांव वाले उसका स्वागत करते हैं-
घुन्ना में पीपल गांव का इतिहास है, तिलकिया नदी है, गोभी आलू की रसेदार सब्जी और पूड़ी है। पीपल की पूजा खैनी, व्रत सब गांव के साथ-साथ चलते हैं। अंत भला तो सब भला की तर्ज पर जब परिवार अंजलि की शादी की कोशिश करता है तो शेखर उसके जीवन में फिर आ जाता है-
“अंजलि दुनिया जहान से बेख़बर शेखर की यादों में डूबी थी, वो किसी तरह शेखर की आवाज़ सुनना चाहती थी, उसे हर पल लगता था कि उसका मोबाइल बज रहा है, जबकि उसका मोबाइल शांत था, घंटी मोबाइल में नहीं अंजलि के दिल में बज रही थी। आख़िर दिल की आवाज़ मोबाइल में उतर आई, मोबाइल बज उठा, अंजलि को स्क्रीन पर चमक रहे अननोन नंबर में शेखर का चेहरा दिख गया, लेकिन अंजलि का हाथ ठिठक गया, उसके दिल की धड़कन बढ़ गई, साँसों की गति तेज़ हो गई, अंजलि का शरीर गर्म हो गया, वो प्यार के आवेग में पूरी तरह से गिरफ़्त हो गई, उसका शरीर कांपने लगा, वो सामने पड़े मोबाइल पर शेखर का चेहरा देख तो सकती थी, लेकिन फ़ोन उठाने की ताक़त ना जाने कहाँ गुम हो गई थी। फ़ोन चुप हो गया, अंजलि शांत हो गई।”
उपन्यास का अंत भी बेहद मार्मिक है-
“टीटू मिट्टी में सना घुटनों के बल बैठ गया, उसकी आँखों से बहता आँसू गालों से होते हुए शिशु पौधे की पत्तियों पर टप टप कर गिरने लगा। पत्तियों में टीटू के आँसुओं को लपकने की होड़ लग गई थी। वो इधर से उधर इस तरह से कुलांचे मार रही थी, जैसे वो उछलकर एक बार में ही टीटू की आँखों से बहते आँसू को सोख लेना चाहती हैं….
टीटू भरे गले से बुदबुदाने लगा “बाबा का आशीर्वाद मिल गया, मन्नत पूरी हो गई…”
सारे मिथक टूटकर बिखर चुके थे, नया जनम मिला था, पिता को भी… पीपल को भी…”
200 पृष्ठों के ‘घुन्ना’ को पढ़ते हुए पाठक हमेशा एक रोमांच व उत्कंठा में डूबा रहता है, क्योंकि निर्जल दृश्य गढ़ने में माहिर हैं। साथ ही वे गांव घर की कहानी में पाठकों को डुबा देने की कला भी जानते हैं। टीवी पत्रकार संजय सिंह ‘निर्जल’ के उपन्यास “घुन्ना” का संदेश यह है कि नाराजगी व शिकवे को मन में मत छिपाओ, ये घात को जन्म देता है।
काफी कम समय में ये उपन्यास खूब लोकप्रिय हुआ है। उपन्यास को श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। इसके पेपरबैक संस्करण की कीमत 399 रुपए है।


