धारावी (सं. भा.) दीपावली का त्यौहार सिर पर है और मुंबई के बाजार में कुंभारवाड़ा में बने मिट्टी के दिए बड़े पैमाने पर पहुंच गए हैं। जिस तरह होली का त्योहार रंगों के लिए जाना जाता है। उसी तरह दीपावली का त्यौहार मिठाइयों और दीए के लिए जाना जाता है। दीपावली हो और घरों में दरवाजे पर दीए ना जलाए जाए ऐसा संभव ही नहीं। यही वजह है मिट्टी के दीयों की धमक आज भी बरकरार है ना सिर्फ भारत बल्कि विदेशों में भी कुम्भारवाड़ा के दीयों की मांग होती है। एशिया की सबसे घनी आबादी वाले धारावी के कुम्भार वाडा में पीढ़ी दर पीढ़ी मिट्टी के दीए बनाने का काम होता आया है। यहां करीब साढ़े 13 एकड़ जमीन पर कुंभारवाड़ा बसा हुआ है और करीब हजार कुम्भार रहते हैं। पिछले 120 वर्षों से यहां मिट्टी के बरतन और दीए बनाए जाते हैं जिन्हें ना सिर्फ महाराष्ट्र बल्कि विदेशों में भी भेजा जाता है। इन मिट्टी के दीयों को पकाने के लिए यहां 60 भट्टियां जलाई जाती हैं। इन्हीं भट्टियों में तप कर मिट्टी के दीए बाहर निकलते हैं और दीपावली में धूम मचाते हैं।

दीयों की मिट्टी आती है गुजरात से वैसे मिट्टी के बर्तनों और मटकों के लिए मिट्टी महाराष्ट्र यूपी और गुजरात से आती है लेकिन दीयों को मिट्टी गुजरात से ही आती है और ये मिट्टी राजकोट से ट्रकों में 25/25 टन भरकर आते हैं। मिट्टी की कीमत उसके ट्रांसपोर्ट की वजह से बढ़ जाती है। इसलिए कुम्भार उसे आपस में बांटकर लेते हैं। मिट्टी सीमेंट की गोनियों में भर कर आती है।


